Quran Surah 2 Ayat 230 in Hindi | 2024

1. الم (Alif, Laam, Mim)

  • English: Alif, Laam, Mim (These are the opening letters of the Surah, with no specific meaning in translation)

2. ذَٰلِكَ الْكِتَابُ لَا رَيْبَ فِيهِ هُدًى لِّلْمُتَّقِينَ (यह वही किताब है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह परहेज़गारों के लिए मार्गदर्शन है।)

  • English: That is the Book; in it is no doubt – a guidance for the God-fearing.

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3. الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ الصَّلاةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ (जो लोग ग़ैब पर ईमान रखते हैं और نماز बर्पा करते हैं, और हमने उन्हें जो रोज़ी दिया है उसमें से खर्च करते हैं।)

  • English: Those who believe in the unseen, establish prayer, and spend out of what We have provided for them.

4. وَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ وَبِالْآخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ (और जो लोग उस पर ईमान रखते हैं जो आप पर उतारा गया है और जो आप से पहले उतारा गया है और वे आख़िरत का पूरा यक़ीन रखते हैं।)

  • English: And who believe in what has been revealed to you, [O Muhammad], and what was revealed before you, and of the Hereafter they are certain.

5. أُولَٰئِكَ عَلَىٰ هُدًى مِّن رَّبِّهِمْ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (यही लोग अपने रब की तरफ़ से हदी पर हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं।)

  • English: Those are upon [a way of] guidance from their Lord. And those are the successful.

6. إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (जो लोग काफिर हो चुके हैं उनके लिए ये सब बराबर है, आप उन्हें डराएं या ना डराएं, ये ईमान नहीं लाएंगे।)

  • English: Indeed, it is all the same for those who disbelieve whether you warn them or do not warn them – they will not believe.

7. خَتَمَ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ وَعَلَىٰٓ أَبْصَارِهِمْ غِشَاوَةٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَلِيمٌ (अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी है और उनके कानों में और उनकी आंखों पर परदा डाल दिया है और उनके लिए सख़्त अज़ाब है।)

  • English: Allah has set a seal upon their hearts and upon their hearing, and over their vision is a veil; and for them is a painful punishment.

8. وََمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ آمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالْيَوْمِ الْآخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ (और उनमें से कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लाए हैं, जबकि वे ईमान लाने वाले नहीं)

  • English: And of the people are some who say, “We believe in Allah and the Last Day,” but they are not believers.

9. يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّا أَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ (वे अल्लाह को धोखा देने की कोशिश करते हैं) और वह उन्हें धोखा नहीं देते, बल्कि वे अपने ही आप को धोखा देते हैं और उन्हें इसका एहसास नहीं होता।

  • English: They deceive Allah and those who believe, but they deceive only themselves, and they perceive [it] not.

10. فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزادَهُمُ اللَّهُ مَرَضًا وَلَهُمْ عذابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ (उनके दिलों में बीमारी है, तो अल्लाह ने उनकी बीमारी को बढ़ा दिया है। और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है, इसलिए कि वे झूठ बोलते थे।)

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  • English: In their hearts is disease, so Allah has increased their disease. And for them is a painful punishment because they used to lie.

11. وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِى الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ (और जब उनसे कहा जाता है कि ज़मीन में फ़साद न फैलाओ तो कहते हैं कि हम तो सिर्फ सुधारक ही हैं।)

  • English: And when it is said to them, “Do not cause corruption on the earth,” they say, “We are only reformers.”

12. أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَكِن لَّا يَشْعُرُونَ (क्या ही बुरा है! वही लोग फ़साद करने वाले हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं है।)

  • English: Indeed, it is they who are the corrupters, but they perceive [it] not.

13. وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا كَمَا آمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْ مِنُ الْجُهَّاءِ أَنُؤْ مِنُ الْمُؤْمِنِينَ (और जब उनसे कहा जाता है कि लोगों की तरह ईमान लाओ, तो कहते हैं कि क्या हम मूर्खों की तरह ईमान लाएं? क्या हम ईमान लाने वालों में से हैं?)

  • English: And when it is said to them, “Believe as the people have believed,” they say, “Shall we believe as the fools believe?” Indeed, they are the fools, but they do not know.

14. وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا بِشَيَاطِينِهِمْ قَالُوا إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِئُونَ (और जब वो ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ला चुके हैं। और जब अपने शैतानों से अकेले में मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो सिर्फ उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं।)

  • English: And when they meet those who believe, they say, “We have believed,” but when they are alone with their devils, they say, “Indeed, we are with you, and we are only mocking.”

15. اللَّهُ يَسْخَرُ مِّنْهُمْ وَيَمُدُّ لَهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَخْبَطُونَ عَمًى (अल्लाह उनका मज़ाक उड़ाता है और उनकी ज़िद पे उन्हें और लंबा कर देता है। ये लोग भटकते रहते हैं अंधे होकर।)

  • English: Allah mocks them and prolongs them in their transgression, wandering blindly.

16. أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَتْ تِجَارَتُهُمْ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ (ये वही लोग हैं जिन्होंने गुमराही को हदायत के बदले में खरीद लिया है, तो उनकी सौदेबाजी कोई फायदेमंद नहीं रही और वे हदायत पाने वाले नहीं थे।)

  • English: Those are the ones who have purchased error [in exchange] for guidance, so their transaction has brought them no profit, nor were they guided.

17. مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ الَّذِي أَوْقَدَ نَارًا فَلَمَّا أَضَاءَتْ مَا حَوْلَهُ ذَهَبَ اللَّهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِي ظُلُمَاتٍ لَّا يُبْصِرُونَ (उनकी मिसाल उस शख्स की तरह है जिसने आग जलाई, तो जब उसने अपने आसपास को रोशन कर दिया, तो अल्लाह ने उनका नूर छीन लिया और उन्हें अंधेरों में छोड़ दिया कि वे कुछ नहीं देख पाते।)

  • English: Their parable is like that of one who kindled a fire, but when it illuminated what was around him, Allah took away their light and left them in darknesses [so] they do not see.

18. صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ (वे बहरे, गूंगे, अंधे हैं, तो वे वापस नहीं आते।)

  • English: Deaf, dumb, and blind – so they will not return.

19. أَوْ كَصَيِّبٍ مِّنَ السَّمَاءِ فِيهِ ظُلُمَاتٌ وَرَعْدٌ وَبَرْقٌ يَجْعَلُونَ أَصَابِعَهُمْ فِي آذَانِهِم مِّنَ الصَّوَاعِقِ حَذَرَ الْمَوْتِ ۚ اللَّهُ يَحِيطُ بِالْكَافِرِينَ (या फिर आसमान से बरसने वाले पानी की तरह, जिसमें अंधेरे, गरज और बिजली होती है। वे बिजली के डर से मौत से बचने के लिए अपनी उंगलियां अपने कानों में डाल लेते हैं। अल्लाह काफिरों को घेर लेता है।)

  • English: Or [it is] like a rainstorm from the sky within which is darkness, thunder and lightning. They put their fingers in their ears against the thunderclaps in fear of death. But Allah encompasses the disbelievers.
  • 20. يَكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَارَهُمْ كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُمْ مَّشَوْا فِيهِ وَإِذَا أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ وَقَفُوا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (और बिजली उनके देखने की शक्ति को लगभग छीन लेती है। हर बार जब वह उनके लिए रोशनी करती है तो वे उसमें चलते हैं, और जब उन पर अंधेरा छा जाता है तो वे रुक जाते हैं। और अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की शक्तियां छीन लेता। निश्चित रूप से अल्लाह हर चीज पर पूरा सामर्थ्य रखता है।)
  • English: The閃光 (shanguang – flash) almost takes away their sight. Whenever it освещает (oshao – lights up) for them, they walk therein, and when darkness comes over them, they stand still. And if Allah willed, He could take away their hearing and their sight. Indeed, Allah is over all things competent.

21. يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (ऐ लोगों! अपने रब की इबादत करो जिसने तुम्हें पैदा किया और तुमसे पहले के लोगों को भी पैदा किया, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।)

  • English: O mankind, worship your Lord who created you and those who preceded you, that you may become righteous.

22. الَّذِي جَعَلَ الْأَرْضَ فِرَاشًا وَالسَّمَاءَ بَنَاءً وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَّكُمْ فَلَا تَجْعَلُوا مَعَ اللَّهِ أَنْدَادًا وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ (जिसने ज़मीन को बिछाने का सामान बनाया और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया, फिर उसी पानी से ज़मीन से फल निकाले, तुम्हारे लिए रोज़ी के तौर पर। तो तुम अल्लाह के साथ किसी को साझी न ठहराओ, जबकि तुम जानते हो।)

  • English: He who has made the earth a spreading bed and the heaven a ceiling and from the heaven has brought down rain and brought forth therewith fruits for your sustenance. So do not set up equals to Allah while you know [that none has the right to be worshipped but Allah].

23. وَإِن كُنْتُمْ فِي رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأَتُوا بِسُورَةٍ مِّنْ مِّثْلِهِ وَادْعُوا شُهَدَاءَكُم مِّنْ دُونِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (और अगर तुम उसमें संदेह में हो जो हमने अपने बंदे पर उतारा है तो तुम भी उसके जैसा एक सورة लाओ और अपने गवाहों को अल्लाह के सिवा बुलाओ, अगर तुम सच्चे हो।)

  • English: And if you are in doubt about what We have sent down upon Our Servant [Muhammad], then produce a chapter like it and bring forth your witnesses other than Allah, if you are truthful.

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24. فَإِنْ لَّمْ تَفْعَلُوا وَلَنْ تَفْعَلُوا فَاتَّقُوا النَّارَ الَّتِي وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ أُعِدَّتْ لِلْكَافِرِينَ (अगर तुम ऐसा न कर सको, और तुम ऐसा कर भी नहीं सकोगे, तो उस आग से डरो जिसका ईंधन लोग और पत्थर हैं। वो आग काफिरों के लिए तैयार की गई है।)

  • English: But if you do not – and you will never be able to – then fear the Fire, whose fuel is men and stones, prepared for the disbelievers.

25. وَبَشِّرِ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ كُلَّمَا رُزِقُوا مِنْهَا قَالُوا هَذَا وَحُشِرْنَا لَهُ ۚ وَجَزَاءُ الْحُسْنَىٰ الْحُسْنَىٰ (और उन लोगों को खुशखबरी दे दो जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए। उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती हैं। जब कभी उन्हें वहां से कोई रोज़ी दिया जाएगा तो वे कहेंगे कि यही है और हमें इसके लिए ही उठाया गया था। और अच्छाई का बदला सिर्फ अच्छाई ही है।)

  • English: And give good tidings to those who believe and do righteous deeds that for them are gardens beneath which rivers flow. Whenever they are provided with anything from its fruit, they will say, “This is what we were provided with before.” And they will be given things of similar purity. And for them is the forgiveness of their Lord and a gracious residence.

26. وَكَيْفَ تَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَكُنْتُمْ أَمْوَاتًا فَأَحْيَاكمْ ثُمَّ يُوَمِيْكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (और तुम अल्लाह का इन्कार कैसे कर सकते हो, जबकि तुम पहले मृत थे फिर उसने तुम्हें ज़िंदा किया, फिर वह तुम्हें मौत देगा, फिर तुम्हें ज़िंदा करेगा, फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे।)

  • English: And how can you disbelieve in Allah while you were lifeless and He brought you to life; then He will cause you to die, and then He will bring you back to life; and then to Him you will be returned.

27. هُوَ الَّذِي أَنْشَأَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةً قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ (वही है जिसने तुम्हारे लिए कान, आंखें और दिल पैदा किए। तुम बहुत कम शुक्र अदा करते हो।)

  • English: It is He who has created for you hearing and sight and hearts. But little do you give thanks.

28. هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّنَ التُّرابِ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ مِنْ مُضْغَةٍ مُخَلَّقَةٍ وَغَيْرِ مُخَلَّقَةٍ ۚ نُصَيِّرُهَا فِي أَرْحَامٍ كَمَا شِئْنَا ثُمَّ نُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا شَيْخًا ۖ وَمِنكُم مَّنْ يُتَوَفَّىٰ مِنْ قَبْلُ وَمِنكُم مَّنْ يُؤَخَّرُ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۚ وَتَعْلَمُونَ وَلَوْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ (वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर एक बूंद से, फिर जमे हुए खून के टुकड़े से, फिर मांस के लोथड़े से, जिसका कुछ आकार बन चुका है और कुछ नहीं बना है। हम उसे गर्भों में ठहराते हैं जैसा हम चाहते हैं, फिर हम तुम्हें बच्चे के रूप में निकालते हैं, फिर तुम जवान हो जाओ, फिर तुम बुढ़ापे को पहुंचो। और तुम में से कोई तो मृत्यु से पहले ही ले लिया जाता है, और तुम में से कोई एक निर्धारित समय तक टाल दिया जाता है। और तुम जानते हो, (यदि तुम समझते हो)।

  • English: It is He who created you from dust, then from a sperm-drop, then from an clinging clot, then a lump of flesh, partly formed and partly unformed – We settle it in the wombs as We please – then We deliver you as infants. Then you reach your maturity, and of you are those who reach old age. And of you are those who are taken away [before then], and of you are those who are deferred to a designated term. And you will surely know, if you were to understand.

29. هُوَ الَّذِي يُنْشِئُكُمْ ثُمَّ يُتَوَفَّاكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ إِنَّ اللَّهَ لَخَلَّاقٌ عَلِيمٌ (वही है जो तुम्हें पैदा करता है, फिर तुम्हें मृत्यु देता है, फिर तुम्हें ज़िंदा करता है। निश्चय ही अल्लाह बड़ा बनाने वाला, हर चीज को जानने वाला है।)

  • English: It is He who originates you and takes you back (by death), and He is the Most Generous, the Knowing.

30. أَلَمْ تَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يُسْقِطُ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَيُصْدِرُهُ فِي الْأَرْضِ فَتُخْرِجُ مِنْهَا أَنْوَاعًا مِّنْ زَرْعٍ مُّخْتَلِفَةٍ أَلْوَانُهَا فِي ح隅ٍ غَلِيظٌ وَكَذَلِكَ يُغَيِّرُ اللَّهُ الْخَلْقَ ʾأَفَلَا تَعْقِلُونَ (क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह आसमान से पानी बरसाता है, फिर उसे ज़मीन में घुला देता है, फिर तुम उसके जरिए तरह-तरह के पौधे निकालते हो जिनके रंग अलग-अलग होते हैं? (कभी) किसी खेत में वे घने होते हैं (और कभी) किसी में कम। इसी तरह अल्लाह ख़लक़ को बदलता रहता है। क्या तुम लोग समझते नहीं हो?)

  • (Have you not seen that Allah sends down water from the sky, and then dissolves it in the earth? Then you bring out through it different types of plants which have different colors? (Sometimes) in some fields they are dense (and sometimes) in others they are less. This is how Allah keeps changing the creation. Do you? Don’t people understand?)

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30. أَلَمْ تَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يُسْقِطُ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَيُصْدِرُهُ فِي الْأَرْضِ فَتُخْرِجُ مِنْهَا أَنْوَاعًا مِّنْ زَرْعٍ مُّخْتَلِفَةٍ أَلْوَانُهَا فِي حُرُومٍ غَلِيظٌ وَكَذَلِكَ يُغَيِّرُ اللَّهُ الْخَلْقَ ʾأَفَلَا تَعْقِلُونَ (क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह आसमान से पानी बरसाता है, फिर उसे ज़मीन में घुला देता है, फिर तुम उसके जरिए तरह-तरह के पौधे निकालते हो जिनके रंग अलग-अलग होते हैं? (कभी) किसी खेत में वे घने होते हैं (और कभी) किसी में कम। इसी तरह अल्लाह ख़लक़ को बदलता रहता है। क्या तुम लोग समझते नहीं हो?)

  • English: Do you not see that Allah drives water up from the earth and then makes it come forth as clouds? Then He gathers them into layers, and you see the rain emerge from within the layers. And He sends down from the clouds hail, striking therewith whom He wills, and He averts it from whom He wills. The flash of its lightning almost blinds the sight. [Tafsir note: The verse refers to the hydrological cycle and the transformation of water into clouds, rain, and hail]

31. يُقَلِّبُ اللَّيْلَ عَلَى النَّهَارِ وَالنَّهَارَ عَلَى اللَّيْلِ وَيُخْرِجُ الْحَيَاةَ مِنَ الْمَوْتِ وَيُخْرِجُ الْمَوْتَ مِنَ الْحَيَاةِ وَيَرْزُقُ مَنْ يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ (वह रात को दिन पर पलटता है और दिन को रात पर। और वह ज़िंदगी को मौत से निकालता है और मौत को ज़िंदगी से निकालता है। और जिसे चाहता है उसे बिना हिसाब के रोज़ी देता है।)

  • English: He alternates the night and the day, and He brings forth the living from the dead and brings forth the dead from the living. And He provides for whom He wills without account. [Tafsir note: The verse highlights Allah’s power over natural phenomena and His provision for all creation]

32. أَفَتَتَّخِذُونَ مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ لَا يَنفَعُونَ أَنْفُسَهُمْ شَيْئًا وَلَا يَضُرُّونَ (क्या तुम उसके सिवा दूसरों को अपना संरक्षक बनाओगे? जो न तो अपने आपको कोई फायदा पहुंचा सकते हैं और न ही कोई नुकसान।)

  • English: Do you consider besides Him [other] deities who can do nothing for themselves or for you in any way?

33. وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اسْجُدُوا لِلَّهِ يَسْتَكْبِرُونَ وَيَقُولُونَ أَنَسْجُدُ لِلَّذِي أَمَرَنَا الْجِنَّةُ أَنْ نَّسْجُدَ لَهُ ۚ وَيَقُولُونَ اللَّهُ ثالثُ ثَلَاثَةٍ (और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह के आगे सजदा करो, तो वे घमंड करते हैं और कहते हैं कि क्या हम उसी के आगे सजदा करें जिसे जिन्नत ने हमें सजदा करने का हुक्म दिया है? और वे कहते हैं कि अल्लाह तीन का तीसरा है।)

  • ُ  ﻨﻨﺎﻌﺎ (And when they are told to prostrate before Allah, they become arrogant and say, ‘Can we prostrate before Him?’) Do what the jinn have ordered us to prostrate? And they say that Allah is the third of three.)

Surah Al-Baqarah Ayat 34-40 (अल्-बकरा सूरह आयत 34-40)

34. مَا كَانَ اللَّهُ أَنْ يَتَّخِذَ صَحِيبًا سُبْحَانَهُ عَمَّا يَقُولُونَ لَهُ الْملكُ لَهُ الْحَمْدُ كُلُّ شَيْءٍ يَوْرَثُهُ إِلَّا وَجْهُهُ لَهُ الْوَعْدُ وَالْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ (अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह किसी को अपना साझी बनाए। वह उनके कथनों से पाक है, जो वे उसके बारे में कहते हैं। उसी का है राज्य, उसी के लिए सब तारीफें हैं। हर एक चीज नाशवान है सिवाय उसके चेहरे के। वादा उसी का है और हुक्म उसी का है और उसी की तरफ तुम सब लौटाए जाओगे।)

  • English: Allah is not [such] that He would take associates to Himself. Exalted is He above what they describe. [He is] the Sovereign, the Holy. [To Him belongs] whatever is in the heavens and whatever is on the earth. And it is He who is the Inheritor, and [all] inheritance is [due] to Him. To Him belongs the promise and to Him belongs the judgement, and to Him you will be returned.

35. وَقَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا سُبْحَانَهُ إِنَّهُ غَنِيٌّ عَنِ الْوَلَدٍ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ إِنْ كُلٌّ إِلَّا عَلَيْهِ وَكِيلٌ (और वे कहते हैं कि अल्लाह ने बेटा बना लिया है। वह इससे पाक है। वास्तव में वह किसी संतान का मोहताज नहीं। उसी का है जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है। हर एक चीज उसी पर निर्भर है।)

  • English: And they say, “Allah has taken a son.” Exalted is He! He is self-sufficient. To Him belongs what is in the heavens and what is on the earth. And for everything there is from Him a representative. [Tafsir note: The verse rejects the Christian belief in the Trinity and the idea of God having a son]

36. أَتَحْكُمُونَ عَلَى اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۚ اللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (क्या तुम अल्लाह के बारे में बिना इल्म के हुक्म लगा रहे हो? अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।)

  • English: Do you judge about Allah without knowledge? Allah knows, while you do not know.

37. قُولُوا إِنَّ اللَّهَ وَحْدَهُ ۚ اللَّهُ الصَّمَدُ ۚ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ۖ وَلَمْ يَكُنْ لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ (कह दो कि अल्लाह अकेला है। अल्लाह बेपनाह ज़रूरतों को पूरा करने वाला है। न उसने जन्म दिया और न पैदा हुआ। और न उसका कोई हम-सार है।)

  • English: Say, “Allah is [the] One. Allah, the Eternal Refuge. He neither begets nor is born, Nor is there to Him any equivalent.”

38. وَقَالَتِ الْيَهُودُ عُزَيْرٌ ابْنُ اللَّهِ وَقَالَتِ النَّصَارَى الْمَسِيحُ ابْنُ اللَّهِ ۚ قَوْلُهُمْ بِأَفْوَاهِهِمْ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ ۚ مَّثَلُ الَّذِينَ كَفَرُوا كَمَثَلِ آلِ فِرْعَوْنَ ۖ مَا كَانُوا اللَّهُ يُؤْمِنُونَ (और यहूदियों ने कहा कि उज़ैर अल्लाह का बेटा है और ईसाइयों ने कहा कि मसीह अल्लाह का बेटा है। उनके मुंह से निकलने वाली बातें हैं। वे अल्लाह के बारे में झूठ बोलते हैं, उनकी इस बात का उन्हें कोई इल्म नहीं है। इनकार करने वालों की मिसाल फ़िरऔन के लोगों की मिसाल जैसी है। वे अल्लाह पर ईमान नहीं लाते थे।)

  • English: And the Jews say, “Ezra is the son of Allah,” and the Christians say, “The Messiah is the son of Allah.” That is their fabrication out of their mouths. They imitate the speech of those who disbelieved before them. Allah’s curse be upon them, how they are turned away [from the truth]!

39. أَرَادُوا أَنْ يُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ ۚ وَاللَّهُ مُتَمِّمُ نُورِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ (वे चाहते हैं कि अपने मुंह से अल्लाह के नूर को बुझा दें, और अल्लाह अपना नूर पूरा करने वाला है, भले ही काफिरों को यह बात नापसंद हो।)

  • English: They want to extinguish the light of Allah with their mouths, but Allah will perfect His light, although the disbelievers dislike it.

40. هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدىٰ وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ (वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और हक़ के दीन के साथ भेजा है ताकि उसे सारे दीनों पर ग़الب कर दे, भले ही मुशरिक नापसंद करें।)

  • English: It is He who has sent His Messenger with guidance and the religion of truth to manifest it over all religion, although the polytheists hate it.

**41. يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أُنْزِلَ مِنْ قَبْلُ ۚ وَمَنْ يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلآئِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَلًا بَعِيدًا (ऐ ईमान वालो! अल्लाह पर, उसके रसूल पर और उस किताब पर ईमान लाओ जो उसने अपने रसूल पर उतारी है और उस किताब पर ईमान लाओ जो उससे पहले उतारी गई थी। और जो अल्लाह का, उसके फरिश्तों का, उसकी किताबों का, उसके रसूलों का और

**41. (O you who believe! Believe in Allah, in His Messenger, and in the Book which He has revealed through Himself. It is revealed to the Messenger and believe in the Book that was sent down before him, and in what Allah, and His angels, and His Books, and His messengers,

Surah Al-Baqarah Ayat 42-50 (अल्-बकरा सूरह आयत 42-50)

42. اللَّهُ يَسْخَرُ مِّنْهُمْ وَيَمُدُّ لَهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَخْبَطُونَ عَمًى (अल्लाह उनका मज़ाक उड़ाता है और उनकी ज़िद पे उन्हें और लंबा कर देता है। ये लोग भटकते रहते हैं अंधे होकर।)

  • English: Allah mocks them and prolongs them in their transgression, wandering blindly.

43. أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَتْ تِجَارَتُهُمْ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ (ये वही लोग हैं जिन्होंने गुमराही को हदायत के बदले में खरीद लिया है, तो उनकी सौदेबाजी कोई फायदेमंद नहीं रही और वे हदायत पाने वाले नहीं थे।)

  • English: Those are the ones who have purchased error [in exchange] for guidance, so their transaction has brought them no profit, nor were they guided.

44. مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ الَّذِي أَوْقَدَ نَارًا فَلَمَّا أَضَاءَتْ مَا حَوْلَهُ ذَهَبَ اللَّهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِي ظُلُمَاتٍ لَّا يُبْصِرُونَ (उनकी मिसाल उस शख्स की तरह है जिसने आग जलाई, तो जब उसने अपने आसपास को रोशन कर दिया, तो अल्लाह ने उनका नूर छीन लिया और उन्हें अंधेरों में छोड़ दिया कि वे कुछ नहीं देख पाते।)

  • English: Their parable is like that of one who kindled a fire, but when it illuminated what was around him, Allah took away their light and left them in darknesses [so] they do not see.

45. صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ (वे बहरे, गूंगे, अंधे हैं, तो वे वापस नहीं आते।)

  • English: Deaf, dumb, and blind – so they will not return.

46. أَوْ كَصَّيْبَةٍ مِّنَ السَّمَاءِ فِيهَا رَعْدٌ وَبَرْقٌ يُوقِظُونَ يُكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَارَهُمْ كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُمْ يَشْرُوا فِيهِ وَإِذَا أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ يَقُومُونَ ۚ وَإِنْ شَاءَ اللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (या फिर उनका मामला उस आंधी जैसा ہے जो आसमान से आती है, उसमें गरज और बिजली होती है। वे उन्हें जगाते हैं, बिजली उनके पास इतनी नज़दीक होती है कि मानो उनकी आंखों को उड़ा लेगी। जब भी उनके लिए रोशनी करता है, तो वे उसमें चलते हैं, और जब उन पर अंधेरा छा जाता है, तो खड़े हो जाते हैं। और अगर अल्लाह चाहे तो उनकी सुनने और देखने की शक्तियां ले ले। निश्चय ही अल्लाह हर चीज पर पूरा सामर्थ्य रखता है।)

  • English: Or [they are] like those overtaken on a stormy sea, enveloped in darkness, thunder and lightning. They put their fingers in their ears against the thunder’s crash, fearing death. But whenever the light reaches them, they walk in it, but when darkness engulfs them, they stand still. And if Allah willed, He could take away their hearing and their sight. Indeed, Allah is over all things competent.

47. يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَيَوْمِ الْآخِرَةِ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطيعُوا الرُّسُلَ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاحْذَرُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ (ऐ ईमान वालो! अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान लाओ। और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो। और रसूलों की इताअत करो और अल्लाह से डरो और बचो। निश्चय ही अल्लाह की सज़ा बहुत सख़्त है।)

  • English: O you who have believed, believe in Allah and the Last Day, and establish prayer, and give zakāh, and obey the Messenger, and fear Allah and beware. Indeed, Allah is شدید العقاب (Shadid al-Iqaab) – severe in punishment.

48. وَلا تَطْمَعُوا فِي أَنْ تَنالُوا مَا آتَيْنَا آخَرِينَ ۚ إِنْ كَانُوا يُؤْثِرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا عَلَى الْآخِرَةِ ۚ وَاللَّهُ يُؤْثِرُ الْآخِرَةَ عَلَى الدُّنْيَا ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِكُلِّ شَيْءٍ (और तुम दूसरों को जो हमने दिया है उसमें लालच न करो। अगर वे दुनिया की जिंदगी को आख़िरत पर पसंद करते हैं, तो अल्लाह आख़िरत को दुनिया पर पसंद करता है। और अल्लाह हर चीज को जानने वाला है।)

  • English: Do not desire what We have given to others. For they have preferred the life of this world to the Hereafter, and Allah prefers the Hereafter to this world. And Allah is Knowing of all things.

49. وَمَا قَتَلْتُمْ مِّنْ سُوَيٍّةٍ فَفِدْيَةٌ مِّنْ مِّثْلِهَا ۚ أُولَئِكُمْ أَوْلَى بِالْعَهْدِ ۚ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا ۚ فَإِنَّا عَلَيْكُمْ نَصِيرٌ (और तुमने जो बेगुनाह को मार डाला है तो उसके बदले में उसकी तरह का क़िस्सा। ये लोग (रिश्तेदार) इस (क़िस्सा) के ज्यादा हक़दार हैं। सिवाय उन लोगों के जिन्होंने ज़ुल्म किया। तो हम तुम्हारे मददगार हैं।)

  • English: And if you have killed [unintentionally] a believer, [you must] then free a believing slave. And whoever does not find [one] – then a continuous fast for two months, seeking forgiveness of Allah. And Allah is Forgiving, Merciful.

[Tafsir note: This verse refers to the Islamic law of Qisas (retaliation) for unintentional killings]**

50. فَاعْفُوا عَنْهُمْ وَاصْفَحُوا إِنْ تُرِيدُوا الرِّضْوَانَ مِّنَ اللَّهِ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ (तो अगर तुम अल्लाह की रिज़ा चाहते हो तो उन्हें माफ़ कर दो और (उनसे) दरगुज़र करो। और अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, रहम करने वाला है।)

  • English: But if you pardon him and overlook [the offense] and forgive, then indeed, Allah is Forgiving, Merciful.

51. وَإِذَا حَكَمْتُمْ بَيْنَ النَّاسِ فَاحْكُمُوا بِالْعَدْلِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ (और जब तुम लोगों के बीच फैसला करो तो इंसाफ के साथ फैसला करो। निश्चय ही अल्लाह इंसाफ़ करने वालों को पसंद करता है।)

  • English: And when you judge between the people, you judge with justice. Indeed, Allah orders you to [do] good and justice and to give to relatives. And He forbids immorality and evil conduct and oppression. He reminds you – that you may remember.

Surah Al-Baqarah Ayat 52-60 (अल्-बकरा सूरह आयत 52-60)

52. وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ ۖ فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ ۚ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَيَصْطَبِرُونَ وَيَخْشَوْنَ اللَّهَ ۚ أُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और तुम में से जो हुक्मरां हैं उनकी भी। अगर तुम किसी मामले में आपस में झगड़ो तो उसे अल्लाह और उसके रसूल के पास ले जाओ। अगर तुम ईमान लाने वाले हो। जो लोग अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान लाते हैं और सब्र करते हैं और अल्लाह से डरते हैं। ये ही लोग कामयाब होने वाले हैं।)

  • English: And obey Allah and the Messenger, and those in authority among you. And if you dispute over anything, refer it to Allah and the Messenger, if you are believers. Those who believe in Allah and the Last Day and fear Allah – it is those who are the successful.

53. أَوَلَمْ يَكُن لَّكُمْ مِّثْلُ دَأْبِ آلِ فِرْعَوْنَ الَّذِينَ كَذَّبُوا مُوسَى مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُ الْبَيِّنَاتُ وَاللَّهُ مُحيطٌ بِالظَّالِمِينَ (क्या तुम्हें फिरऔन के लोगों की तरह का हाल नहीं हुआ? जिन्होंने मूसा को उसके पास स्पष्ट निशानियां आने के बाद भी झुठला दिया। और अल्लाह ज़ालिमों को चारों तरफ से घेर लेने वाला है।)

  • English: Has there not been for you an example in the people of Pharaoh, who denied Moses after the clear proofs had come to him? And Allah is encompassing of the wrongdoers.

[Tafsir note: This verse refers to the Israelites who disobeyed Moses after witnessing his miracles]**

54. وَيَقُولُونَ نَصَدِّقُ بِبَعْضٍ وَنَكْفُرُ بِبَعْضٍ وَيُرِيدُونَ أَنْ يَتَّخِذُوا بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلاً (और वे कहते हैं कि हम कुछ की तो तस्दीक़ करते हैं और कुछ का इंकार करते हैं। और वे चाहते हैं कि इन दोनों के बीच कोई रास्ता निकाल लें।)

  • English: And they say, “We believe in some and disbelieve in some,” and they wish to take an intermediate course.

55. وَمَا يَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يُكَذِّبُوا اللَّهَ وَآيَاتِهِ ۚ وَالظَّالِمُونَ لَا يُفْلِحُونَ (वे कुछ नहीं चाहते सिवाय इसके कि अल्लाह और उसकी आयतों को झुठला दें। और ज़ालिम कभी कामयाब नहीं हो सकते।)

  • English: Never will they succeed except that they disbelieve in Allah and His signs. And the wrongdoers will not succeed.

55. وَإِذْ قُلْتُمْ يَٰمُوسَىٰ لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَى ٱللَّهَ جَهْرَةٗ فَأَخَذَتْكُمُ ٱلصَّٰعِقَةُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ٥٥ (Aur woh waqt yaad karo jab tumne kaha tha Aye Musa hum tumhein tab tak nahi maanege jab tak hum Allah ko khullam khulla nahi dekh lenge. Phir tumhein bijli ne pakar liya jis waqt tum dekh rahe the.)

  • English: And [remember] when you said, “O Moses, we will never believe in you until we see Allah with our own eyes,” so a thunderbolt struck you while you were looking on.

56. ثُمَّ أَبعَثْنَاكمْ مِّن بَعْدِ وَفَاتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ٥٦ (Phir humne tumhein tumhari maut ke baad zinda kar diya taake tum shukr karo.)

  • English: Then We brought you back to life after your death, so that perhaps you would be grateful.

57. وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوىٰ ؕ كُلُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ ۚ وَمَا ظَلَمُوا اللَّهَ وَلٰكِن كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ٥٧ (Aur humne tum par badal ka saya kar dia aur tum par manna aur salve (quails) barseye. Khaao un tayyibaat mein se jo humne tumhein di hain. Woh Allah par zulm nahi karte the balki woh khud apni jaanon par zulm karte the.)

  • English: And We shaded you with the clouds and sent down to you manna and quails, [saying], “Eat from the good things We have provided for you.” And they did not wrong Us, but they were wronging themselves.

58. وَإِذْ قُلْنَا ادْخُلُوا هٰذِهِ الْقَرْيَةَ فَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا حِطَّهٌ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَايَاكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ ٥٨ (Aur woh waqt yaad karo jab humne kaha tha is shahr mein dakhil ho aur jis jagah chaho wahan se khate hue aaram se raho aur darwaze par sajda karte hue dakhil ho aur kehdo ‘Hattana’ (hum tumhare gunaah maaf kar denge) aur hum neki karne walon ko ziyada denge.)

  • English: And [remember] when We said, “Enter this city and eat from it freely wherever you wish – but with humility – and enter the gate in submission and say, ‘Forgive us.’ We will forgive you of your sins and increase the reward of the doers of good.”

59. فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ رِّجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ ٥٩

Hindi Translation:

लेकिन उन ज़ुल्म करने वालों ने उन लफ़्ज़ों को बदल दिया जो उन से काहे गए थे। फिर हमने उन पर आसमान से अज़ाब उतारा उनकी फिस्क (नफ़रमानी) की वजह से।

English Translation:

59. But those who transgressed changed the statement to other than that which had been said to them. So We sent down upon them a punishment from the sky because of their فسق (fisq – disobedience, sinfulness, transgression)

60. وَإِذْ وَاعَدْنَا مُوسَىٰ ثَلَاثِينَ لَيْلَةً ثُمَّ أَتْمَمْنَاهَا بِعَشْرٍ فَتَمَّ مِيقَاتُ رَبِّهِ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً وَقَالَ مُوسَىٰ لِأَخِيهِ هَارُونَ اخْلُفْنِي فِي قَوْمِي وَأَصْلِحْ وَلاَ تَتَّبِعْ سَبِيلَ الْمُفْسِدِينَ

Hindi Translation:

और जब मूसा (अ.स.) हमारे मुकर्रर वक़्त पर पहुंचें और उनके रब ने उनसे बात की तो उन्हें कहा, “ऐ मेरे रब! मुझे अपना दीदार कराओ ताकि मैं आपको देख सकूं।” अल्लाह ने फरमाया, “तुम मुझे नहीं देख पाओगे, लेकिन अगर यह पहाड़ अपनी जगह पर कायम रहे तो तुम मुझे देख पाओगे।” जब उनके रब ने पहाड़ पर तजल्ली की तो उसने ज़मीन पर गिरा दिया और मूसा (अ.स.) बेहोश हो गए। जब उन्हें होश में आया तो उन्हें कहा, “आप पाक और पाक हैं! मैं आपकी तरफ तौबा करता हूं और मैं पहला मोमिन हूं।”

English Translation:

60. And [mention] when We appointed for Moses forty nights, and then completed them with ten, so the appointment of his Lord was entirely forty nights. And Moses said to his brother Aaron, “Take my place among my people and rectify [their affairs] and do not follow the way of the corrupters.”

61. قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنِّي اصْطَفَيْتُكَ بِرِسَالَاتِي وَبِكَلِمَاتِي فَخُذْ مَا آتَيْتُكَ وَكُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ

Hindi Translation:

Allah ne farmaya, “Aye Musa (a.s.)! Maine apne risalon aur apne kalamon se tumhen logon par fazilat di hai. Isliye jo kuchh maine tumhen diya hai use pakad lo aur shukrguzar raho.”

English Translation:

61. [Allah] said, “O Moses, indeed I have favored you with My messages and with My speech, so take what I have given you and be of the grateful.”

62. وَكَتَبْنَا لَهُ فِي الْأَلْوَاحِ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَّوْعِظَةً وَتَفْصِيلًا لِّكُلِّ شَيْءٍ فَخُذْهَا بِقُوَّةٍ وَأْمُرْ قَوْمَكَ بِأَخْذِ أَحْسَنِهَا سَأُرِيكُمْ دَارَ الْفَاسِقِينَ

Hindi Translation:

और हमने उनके लिए तमाम अहकाम की लौहें पर लिख दिया – हिदायत और हर चीज़ की तफ़सील – “इसलिए इसे मज़बूती से पकड़ लो और अपनी क़ौम को इसके बेहतरी का हुक्म दो। मैं तुम्हें फासीकों का ठिकाना दिखा दूंगा।”

English Translation:

62. And We wrote for him upon the tablets [of something] from every matter – reminder and explanation of everything – so hold firmly to it and instruct your people to take the best of it. I will show you the dwelling place of the defiantly disobedient.”

63. وَسَأَصْرِفُ الَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَإِنْ يَرَوْا كُلَّ آيَةٍ لاَّ يُؤْمِنُوا بِهَا وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الرَّشَدِ لاَّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلاً وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلاً ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ

Hindi Translation:

और मैं अपने निशानियों से उन लोगों को मुकररिफ़ कर दूंगा जो ज़मीन पर नहक़ घमंड करते हैं। और अगर ये हर निशानी को देख भी लें तो भी इनमें ईमान नहीं लाएंगे। और अगर ये राह-ए-रश्द (मार्गदर्शन) को देख भी लें तो भी वो हमें रास्ते को नहीं चुनेंगे। लेकिन अगर वो गुमराह रास्ते को देखते हैं तो वो उसे अपना रास्ता समझेंगे। ये इसलिए है क्योंकि वो हमारी निशानियों को झुठलाते हैं और उनसे बहुत दूर हैं।

English Translation:

63. And I will turn away from My signs those who are arrogant in the earth without right, and even if they see every sign, they will not believe in it. And if they see the way of رشاد (rashd – guidance), they will not take it as a way. But if they see the way of error, they will take it as a way. That is because they have denied Our signs and have been of them neglectful.

64. وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَلِقَاءِ الْآخِرَةِ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ

Hindi Translation:

और वो लोग जो हमारी निशानियां और आख़िरत के मुक़ाबले को झुठलाते हैं, उनके कर्म बेकार हो गए हैं। क्या उन्हें इनाम में कुछ और मिलेगा सिवाय इसके जो वो करते रहे?

English Translation:

64. And those who have denied Our signs and the meeting of the Hereafter – their deeds have become worthless. Will they be recompensed except for what they used to do?

65. وَاتَّخَذَ قَوْمُ مُوسَىٰ مِنْ بَعْدِهِ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلاً جَسَدًا لَّهُ خُوَارٌ أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْدِيهِمْ سَبِيلاً إِتَّخَذُوهُ إِلَهًا ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ

Hindi Translation:

और बानी इसराइल के लोगों ने मूसा (अ.स.) के जाने के बाद सोने के बच्चे को, जो एक ज़ेवर था, इबादत के लिए बना लिया। उन्हें ये याद नहीं आ रहा कि वो उनसे बात कर सकते थे और फिर भी उन्हें किसी रास्ते की हिदायत दे सकते थे। वो उसको इबादत के लिए लेकर ही ज़ुल्म कर रहे थे।

English Translation:

65. And the people of Moses took, after him, from their ornaments a calf – a body having a hollow mooing. Did they not see that it could neither speak to them nor guide them to a way? They took it as a deity, and they were wrongdoers.

66. وَقَدْ قَالَ لَهُمُ الْحَارُونُ مِنْ قَبْلُ يَا قَوْمُ إِنَّمَا فُتِنْتُمْ بِهِ وَإِنَّ رَبَّكُمُ الرَّحْمَنُ فَاتَّبِعُونِي وَأَطِيعُوا أَمْرِي

Hindi Translation:

और उन्हें ये भी याद दिला दिया कि हारून (अ.स.) ने उन्हें पहले कहा था, “ऐ मेरी क़ौम! तुम इस बच्चे के ज़रीए सिर्फ फ़िटने में डाल गए हो। और तुम्हारे रब (अल्लाह) तो बहुत ही मेहराम (रहमान) हैं” हैं। इसलिए मेरी इत्तेबार करो और मेरे हुक्म की तमिल करो।”

English Translation:

66. And [mention] when Harun had said to them before, “O my people, you are only being tempted by it [the calf]. And indeed, your Lord is the Most Merciful, so follow me and obey my command.”

67. قَالُوا لَنْ نَبْرَحَ عَلَيْهِ عاكِفِينَ حَتَّى يَرْجِعَ مُوسىٰ إِلَيْنَا

Hindi Translation:

अन्होने कहा, “हम इसपर (बच्चे पर) जुड़े रहेंगे और उसकी इबादत करते रहेंगे जब तक मूसा (अ.स.) वापस नहीं आ जाते।”

English Translation:

67. They said, “We will not cease to devote ourselves to it [the calf] until Moses returns to us.”

68. فَلَمَّا رَجَعَ مُوسَىٰ غَضِبَانَ آسِفًا قَالَ سَاءَ مَا فَعَلْتُمْ مِّنْ بَعْدِي أَوَلَا اتَّبَعْتُمْ أَمْرِي

Hindi Translation:

और जब मूसा (अ.स.) गुस्से और परेशानी के साथ लौट कर आये तो उन्हें कहा, “तुमने मेरे बाद बहुत बुरा काम किया! क्या तुम मेरे हुक्म की तमिल नहीं करते?”

English Translation:

68. And when Moses returned, angry and grieved, he said, “Evil is what you have done after [my departure]. Did you not wait upon my order?”

69. قَالُوا لَا تَغْضَبْ عَلَيْنَا إِنَّا اتَّبَعْنَا أَمْرَ قَوْمٍ

Hindi Translation:

उनको कहा, “हम पर गुस्सा ना करो। हमने सिर्फ अपनी क़ौम के कुछ लोगों की बात मानी थी।”

English Translation:

69. They said, “Do not be angry with us. We indeed followed the order of the people.”

70. قَالُوا أَفَتَأْتينا بِالسِّحْرِ إِن كُنَّا مُؤْمِنِينَ

Hindi Translation:

उन्होंने कहा, “अगर हम सच में मोमिन हैं तो क्या हम तुम्हारे पास जादू लेकर आये हैं?” (यानी ये बच्चा जादू का ही काम है)

English Translation:

70. They said, “Have we come to you with magic, if we are [truly] believers?” (Implying that the calf is just magic)

71. قَالَ إِنَّمَا أَمْرِي إِلَى اللَّهِ أُوحِيَ إِلَيَّ وَأُلْقِيَ عَلَيَّ أَلْوَاحٌ فِيهَا تَفْصِيلُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ

Hindi Translation:

मूसा (अ.स.) ने कहा, “मेरा हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही देता है। मुझे वही (वही) मिली है और मुझे लौहें दी गई हैं जिन में हर चीज़ की तफ़सील”

English translation

Musa (a.s.) said, “My orders come only from Allah. I have received only Him (He) and I have been given irons in which everything is described.”

72. وَإِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسَىٰ لَنْ نَّصْبِرَ عَلَىٰ طَعَامٍ وَاحِدٍ فَادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنْبِتُ الْأَرْضِ مِنْ بَقَرٍ وَغَنَمٍ وَفُولٍ وَعَدَسٍ وَبَصَلٍ

Hindi Translation:

और याद करो जब तुमने कहा था, “ऐ मूसा (अ.स.)! हम एक ही क़िस्म की खोरक पर सब्र नहीं कर सकते। इसलिए अपने रब से दुआ करो वो हमें ज़मीन से जो उगती है उसमें से कुछ निकले – गाए, भेद , मसूर, दाल और प्याज़।”

English Translation:

72. And [mention] when you said, “O Moses, we will never be able to endure upon one kind of food. So supplicate to your Lord for us that He may produce for us from what the earth grows – of grazing livestock and sheep and lentils and beans and onions.”

73. قَالَ أَتَسْتَبْدِلُونَ الَّذِي هُوَ أَدْنَىٰ بِالَّذِي هُوَ خَيْرٌ أَهْبِطُوا إِلَىٰ مِصْرَ فَإِنَّ لَكُمْ مَا سَأَلْتُمْ وَضُرِبَ عَلَيْهِمْ الذِّلَّةُ وَالْمَسْكَنَةُ وَغَاظَهُمْ مِّنْ غَضَبٍ اللَّهِ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَفْسِقُونَ

Hindi Translation:

मूसा (अ.स.) ने कहा, “क्या तुम अच्छे चीज़ को छोड़ कर कमज़ोर चीज़ को लेना चाहते हो? मिसर जाओ। तुम्हें वो मिल जाएगा जो तुमने मांगा है।” फिर उन पर ज़िल्लत और तंगी डाली गई और अल्लाह का ग़ज़ब उन पर नाज़िल हुआ। ये इसलिए क्योंकि वो नफ़रमानी करते थे।

English Translation:

73. He [Moses] said, “Do you exchange what is better for what is worse? Go down to Egypt, and indeed, you will have what you have requested.” And humiliation and wretchedness were struck upon them, and they were encompassed by the anger of Allah. That was because they were defiant [disobedient].

74. وَإِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسَىٰ لَنْ نُؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَىٰ اللَّهَ جَهْرَةً فَأَخَذَتْكُمُ الصَّاعِقَةُ وَأَنْتُمْ تَنْظُرُونَ

Hindi Translation:

और याद करो जब तुमने कहा था, “ऐ मूसा (अ.स.)! हम तुम पर तब तक ईमान नहीं लाएंगे जब तक हम अल्लाह को खुल्लम खुल्ला नहीं देख लें।” फिर तुम पर बिजली गिरी जब तुम देख रहे थे।

English Translation:

74. And [mention] when you said, “O Moses, we will not believe in you until we see Allah openly,” and the thunderbolt took you while you were looking.

75. ثُمَّ أَحْيَيْنَاكُمْ مِّنْ بَعْدِ وَفَاتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

Hindi Translation:

फिर हमने तुम्हें तुम्हारी मौत के बाद जिंदा कर दिया ताकि तुम शुक्र करो।

English Translation:

75. Then We revived you after your death that you might be grateful.

**76. وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَأَنْزَلْنَا عَلَيْكُمْ مَّنَّا وَسَلْوىٰ كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَلَا تَطْغَوْا فِيَهُ فَيَحِلَّ غَضَبِي عَلَيْكُمْ وَمَنْ يُغْضِبْهُ فَلَقَدْ ضَلَّ سَوِيًّا **

Hindi Translation:

और हमने तुम पर बादलों का साया किया और तुम पर मन्ना वा सलवा (आसमानी खाना) उतारा। तुम्हें जो पाक चीज़ मिली है हमने दी है उन्हें खाओ और उनके बीच में हद से ना बढ़ो वरना मेरा ग़ज़ब तुम पर नाज़िल हो जाएगा। और जिस पर मेरा ग़ज़ब नाज़िल हो वो सीधे रास्ते से गुमराह हो जाएगा।

English Translation:

76. And We shaded you with the cloud and sent down upon you manna and locusts [provisions]. Eat from the good things We have provided for you and do not transgress therein [by excess], lest My anger should descend upon you. And whoever incurs My anger has indeed gone astray.

**77. وَإِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسَىٰ لَنْ نَصْبِرُ عَلَىٰ طَعَامٍ وَاحِدٍ فَادْعُ رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِنَ الْأَرْضِ بَقَرَةً هَاتِهَا صِفَتُهَا كَذَا وَكَذَا قَالَ إِنَّمَا أَنْتُمْ تَسْأَلُونَ عَظِيماً **

Hindi Translation:

और याद करो जब तुमने कहा था, “ऐ मूसा (अ.स.)! हम एक ही क़िस्म की ख़्वाहिश पर सब्र नहीं कर सकते। इसलिए अपने रब से दुआ करो वो हमें ज़मीन से एक गाए निकले। उसकी ये ये निशानियां होंगी.. ।” मूसा (अ.स.) ने कहा, “तुम बहुत मुश्किल चीज़ मांग रहे हो।”

English Translation:

77. And [mention] when you said, “O Moses, we will never be able to endure upon one kind of food. So supplicate to your Lord that He may produce for us from the earth a cow with specific characteristics.” [They described those characteristics.] He [Moses] said, “Indeed, you are asking for something difficult.”

**78. قَالُوا لَنْ نَزُولَ لَكَ حَتَّى تَكَلِّمَنَا الْبَقَرَةُ قَالَ سَيَكَلِّمُكُمْ إِنْ شَاءَ اللَّهُ **

Hindi Translation:

अनहोने कहा, “हम तब तक तसल्ली नहीं होंगे जब तक वो गाए खुद हमसे बात ना करे।” मूसा (अ.स.) ने कहा, “अगर अल्लाह चाहे तो वो तुमसे बात करेगी।”

English Translation:

78. They said, “We will never yield to you until the cow speaks to us clearly.” [Moses] said, “If Allah wills, it will speak to you.”

**79. قَالُوا يَا مُوسَىٰ ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُوَضِّحَ لَنَا مَا هِيَ قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا مُسَوِّمَةٌ لَّا صَغِيرَةٌ وَلَا كَبِيرَةٌ بَيْنَ ذَلِكَ فَاعْتَلُوا بِمَا تُؤْمَرُونَ **

Hindi Translation:

अन्होने कहा, “ऐ मूसा (अ.स.)! अपने रब से दुआ करो वो हमें ये बता दे कि वो कैसी गाई है।” मूसा (अ.स.) ने

English translation :

They said, “O Musa (a.s.)! Pray to your Lord to tell us what kind of song she is.” Musa (a.s.)

**76. وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَأَنْزَلْنَا عَلَيْكُمْ مَّنَّا وَسَلْوىٰ كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَلَا تَطْغَوْا فِيَهُ فَيَحِلَّ غَضَبِي عَلَيْكُمْ وَمَنْ يُغْضِبْهُ فَلَقَدْ ضَلَّ سَوِيًّا **

Hindi Translation:

और हमने तुम पर बादलों का साया किया और तुम पर मन्ना वा सलवा (आसमानी खाना) उतारा। तुम्हें जो पाक चीज़ मिली है हमने दी है उन्हें खाओ और उनके बीच में हद से ना बढ़ो वरना मेरा ग़ज़ब तुम पर नाज़िल हो जाएगा। और जिस पर मेरा ग़ज़ब नाज़िल हो वो सीधे रास्ते से गुमराह हो जाएगा।

English Translation:

76. And We shaded you with the cloud and sent down upon you manna and locusts [provisions]. Eat from the good things We have provided for you and do not transgress therein [by excess], lest My anger should descend upon you. And whoever incurs My anger has indeed gone astray.

**77. وَإِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسَىٰ لَنْ نَصْبِرُ عَلَىٰ طَعَامٍ وَاحِدٍ فَادْعُ رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِنَ الْأَرْضِ بَقَرَةً هَاتِهَا صِفَتُهَا كَذَا وَكَذَا قَالَ إِنَّمَا أَنْتُمْ تَسْأَلُونَ عَظِيماً **

Hindi Translation:

और याद करो जब तुमने कहा था, “ऐ मूसा (अ.स.)! हम एक ही क़िस्म की ख़्वाहिश पर सब्र नहीं कर सकते। इसलिए अपने रब से दुआ करो वो हमें ज़मीन से एक गाए निकले। उसकी ये ये निशानियां होंगी.. ।” मूसा (अ.स.) ने कहा, “तुम बहुत मुश्किल चीज़ मांग रहे हो।”

English Translation:

77. And [mention] when you said, “O Moses, we will never be able to endure upon one kind of food. So supplicate to your Lord that He may produce for us from the earth a cow with specific characteristics.” [They described those characteristics.] He [Moses] said, “Indeed, you are asking for something difficult.”

**78. قَالُوا لَنْ نَزُولَ لَكَ حَتَّى تَكَلِّمَنَا الْبَقَرَةُ قَالَ سَيَكَلِّمُكُمْ إِنْ شَاءَ اللَّهُ **

Hindi Translation:

अनहोने कहा, “हम तब तक तसल्ली नहीं होंगे जब तक वो गाए खुद हमसे बात ना करे।” मूसा (अ.स.) ने कहा, “अगर अल्लाह चाहे तो वो तुमसे बात करेगी।”

English Translation:

78. They said, “We will never yield to you until the cow speaks to us clearly.” [Moses] said, “If Allah wills, it will speak to you.”

**79. قَالُوا يَا مُوسَىٰ ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُوَضِّحَ لَنَا مَا هِيَ قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا مُسَوِّمَةٌ لَّا صَغِيرَةٌ وَلَا كَبِيرَةٌ بَيْنَ ذَلِكَ فَاعْتَلُوا بِمَا تُؤْمَرُونَ **

Hindi Translation:

अन्होने कहा, “ऐ मूसा (अ.स.)! अपने रब से दुआ करो वो हमें ये बता दे कि वो कैसी गाई है।” मूसा (अ.स.) ने

Verses 80-90 of Surah Al-Baqarah: Hindi Translation

80. وَقَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا مُسَوِّمَةٌ لَّا صَغِيرَةٌ وَلَا كَبِيرَةٌ بَيْنَ ذَلِكَ فَاعْتَلُوا بِمَا تُؤْمَرُونَ

Hindi Translation:

Musa (a.s.) ne kaha, “Woh yeh kahti hai ki woh ek aisi gae hai jiski umar batai nahin ja sakti. Woh na toh bahut choti hai aur na hi bahut badi. Woh dono ke beech ki hai. Isliye tumhein jo hukm diya gaya hai us par amal karo.”

81. قَالُوا وَادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُوَضِّحَ لَنَا إِنَّهَا لَنَا لَوْقَدْ ضَلَلْنَا فِيهَا قَالَ قَدْ أُوحِيَ إِلَيْكُمْ أَنَّهَا بَقَرَةٌ صَفْرَاءُ صِفْرَةٌ تَسُرُّ النَّاظِرِينَ

Hindi Translation:

81. Unhone kaha, “Apne Rab se dua karo woh humein yeh bata de ki woh kaisi rang ki hai. Hum toh bilkul pareshaan ho gaye hain.” Musa (a.s.) ne kaha, “Tumhein yeh bataya gaya hai ki woh ek zaafrani rang ki gae hai jo dekhne walon ko khush karti hai.”

**82. وَقَالُوا وَادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُوَضِّحَ لَنَا إِنَّهَا لَنَا لَكَثِيرٌ مِنَّا شَكٌّ فِيْهَا قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا ذَلُولٌ لِّلْحَرْثِ وَلَا تَسْقِي الْحَرْثَ عَوَازِلُ مِّنَ الْخُطُوطِ مُّسَلَّمَةٌ **

Hindi Translation:

82. Unhone kaha, “Apne Rab se dua karo woh humein yeh bata de ki woh kaisi hai. Hum mein se bahut logon ko is baare mein shak hai.” Musa (a.s.) ne kaha, “Woh yeh kahti hai ki woh woh gae nahin hai jise kheti badi karte hain aur na hi woh paani dene ke liye hai. Woh har qism ke nishan se bachne waali aur be-aib hai.”

83. قَالُوا الآنَ جِئْتَ بِالْحَقِّ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا يَفْعَلُونَ

Hindi Translation:

उनको कहा, “अब तुमने सही बात कही।” फिर अन्होने वो गाए ज़बाह कर दी। लेकिन वो इसे करते थे।

84. وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَتَنَازَعْتُمْ فِيهَا وَأَخْفَىٰ بَعْضُكُمْ شَهَادَةً فَأَخْرَجَ اللَّهُ مَا كُنتُمْ تَخْفُونَ

Hindi Translation :

और जब तुमने एक जान को मारा और उसमें तुम आपस में झगड़ने लगे और तुम में से कुछ ने गवाही छिपाई तो अल्लाह ने वह बात खोलकर बयान कर दी जो तुम छिपा रहे थे

English Translation :

And when you killed a soul and then disputed over it, and some of you concealed the testimony. But Allah was to bring forth that which you were concealing.pen_spark

Verse 85 (Arabic):
وَأَنتُمْ هَٰؤُلَاءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًا مِّنكُم مِّن دِيَارِهِمْ تَظَاهَرُونَ عَلَيْهِم بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَارَىٰ تُفَادُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ ۚ فَمَا جَزَاءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْيٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰ أَشَدِّ الْعَذَابِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ

Verse 85 (Hindi):
फिर तो तुम लोग एक दूसरे को बोझ डालते फिरोगे, और कुछ आपसी मुक़द्दमेबाज़ वे कुछ लोग हैं जो पूरे क़ुरान को नष्ट कर देना चाहते हैं। क्या तुम लोगों को नसीहत नहीं मिली?

Verse 85 (English):
Then you are those [same ones who are] killing one another and evicting a party of your people from their homes, cooperating against them in sin and aggression. And if they come to you as captives, you ransom them, although their eviction was forbidden to you. So do you believe in part of the Scripture and disbelieve in part? Then what is the recompense for those who do that among you except disgrace in worldly life; and on the Day of Resurrection they will be sent back to the severest of punishment. And Allah is not unaware of what you do.

Verse 86 (Arabic):
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ

Verse 86 (Hindi):
जो कोई किसी को नाराेज कर दे और उसके बाद अपना गलतीयां को बदल दे, तो उसका बदला अल्लाह ही से होगा। अल्लाह जानता है और सुनता है।

Verse 86 (English):
Those are the ones who have bought the life of this world [in exchange] for the Hereafter, so the punishment will not be lightened for them, nor will they be aided.

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 86 to 90, in Arabic, Hindi, and English:

Verse 86 (Arabic):
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ

Verse 86 (Hindi):
जो कोई किसी को नाराेज कर दे और उसके बाद अपना गलतीयां को बदल दे, तो उसका बदला अल्लाह ही से होगा। अल्लाह जानता है और सुनता है।

Verse 86 (English):
Those are the ones who have bought the life of this world [in exchange] for the Hereafter, so the punishment will not be lightened for them, nor will they be aided.

Verse 87 (Arabic):
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَقَفَّيْنَا مِن بَعْدِهِ بِالرُّسُلِ ۖ وَآتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَىٰ أَنفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ

Verse 87 (Hindi):
उन्हें तो उनके दिलों में कुछ भी ख़ोजने का मन है। इसलिए उन्हें दण्ड का बारहा नहीं होगा, और उन्हें न कोई मदद मिलेगी।

Verse 87 (English):
And We did certainly give Moses the Scripture and followed up after him with messengers. And We gave Jesus, the son of Mary, clear proofs and supported him with the Pure Spirit. But is it [not] that every time a messenger came to you, [O Children of Israel], with what your souls did not desire, you were arrogant? And a party [of messengers] you denied and another party you killed.

Verse 88 (Arabic):
وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ

Verse 88 (Hindi):
और उन्होंने कहा था कि हमारे दिल इल्म से पर्दा है, अल्लाह ने इनकी दिलों पर पर्दे डाले हैं, इसलिए उन्हें अधिक नराज़गी हासिल नहीं होगी। और उनको बड़ा दुख मिलेगा।

Verse 88 (English):
And they say, “Our hearts are wrapped.” But, [in fact], Allah has cursed them for their disbelief, so little is it that they believe.

Verse 89 (Arabic):
وَلَمَّا جَاءَهُمْ كِتَابٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَمَّا جَاءَهُم مَّا عَرَفُوا كَفَرُوا بِهِ فَلَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الْكَافِرِينَ

Verse 89 (Hindi):
और जब इस्राइलियों के पास उस सच्चा इल्म आया, जो किताब को पहचानता था, तो उन्होंने उसे अपने पीछे ठुकरा दिया।

Verse 89 (English):
And when there came to them a Book from Allah confirming that which was with them – although before they used to pray for victory against those who disbelieved – but [then] when there came to them that which they recognized, they disbelieved in it; so the curse of Allah will be upon the disbelievers.

Sure, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 90 to 95, in Hindi and English:

Verse 90 (Arabic):
بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ فَبَاؤُوا بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ

Verse 90 (Hindi):
बुरा है वह जिसके लिए वह अपनी आत्मा को बेच देता है कि वह वह काफ़िरी करे जो अल्लाह ने अपना वही सत्य उतारा है, ताकि वह अपने बंदों में जिसको चाहे अपनी रहमत से उतारे। इसलिए उनके ऊपर एक बार गुस्सा आता है और उसके ऊपर एक बार और। और काफिरों के लिए नीच अज़ाब है।

Verse 90 (English):
Evil is that for which they have sold themselves, that they should disbelieve in what Allah has revealed, grudging that He should reveal of His grace unto whom He will of His bondmen. So they have drawn on themselves wrath upon wrath. And for disbelievers is a shameful doom.

Verse 91 (Arabic):
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا نُؤْمِنُ بِمَا أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَاءَهُ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنبِيَاءَ اللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 91 (Hindi):
और जब उनको कहा जाता है कि अल्लाह ने उतारा है, तो वे कहते हैं कि हम उस से क्या नहीं मांगते जो हमारी पूरी चाहत हो। उनको उसके गोपन में उतारा है, जो वे नहीं जानते। कहो तुम लोगों ने अल्लाह के नबीयों को पहले क्यों मार डाला, अगर तुम मोमिन हो?

Verse 91 (English):
And when it is said unto them: Believe in that which Allah hath revealed, they say: We believe in that which was revealed unto us. And they disbelieve in that which cometh after it, though it is the truth confirming that which they possess. Say (unto them, O Muhammad): Why then slew ye the prophets of Allah aforetime, if ye are (indeed) believers?

Verse 92 (Arabic):
وَلَقَدْ جَاءَكُم مُّوسَىٰ بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِن بَعْدِهِ وَأَنتُمْ ظَالِمُونَ

Verse 92 (Hindi):
और मूसा ने तो तुम्हारे सामने सबूतों के साथ आ गए थे, फिर भी तुमने उसके बाद गैर अधिकारी होकर गैल मूसा को चीज़ेँ बनाने लगे।

Verse 92 (English):
And verily Moses came unto you with clear proofs (of Allah’s Sovereignty), yet, while he was away, ye chose the calf (for worship) and ye were wrong-doers.

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 93 to 95, in Hindi and English:

Verse 93 (Arabic):
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ الطُّورَ خُذُوا مَا آتَيْنَاكُم بِقُوَّةٍ وَاسْمَعُوا ۖ قَالُوا سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ ۚ قُل بِئْسَمَا يَأْمُرُكُم بِهِ إِيمَانُكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 93 (Hindi):
और जब हमने तुमसे वादा किया और तुम पर तूफान उठाया, तो हमने तुमसे कहा: “हमने तुमको जो दिया है, लेकर आओ” और तुमने कहा: “हमने सुना और नाख़ुस किया”, और अपने दिलों में क़फ़र को पी लिया। कहो: “तुम्हारे ईमान के अनुसार तुम्हें क्या आदेश दिया गया है, बेहद बुरा है वह, अगर तुम मोमिन हो?”

Verse 93 (English):
And when We made with you a covenant and raised over you the Mount, (saying): “Hold firmly to what We have given you and listen.” They said: “We hear and we disobey.” And their hearts absorbed (the worship of) the calf because of their disbelief. Say: “Worst indeed is that which your faith enjoins on you if you are believers.”

Verse 94 (Arabic):
قُلْ إِن كَانَتْ لَكُمُ الدَّارُ الْآخِرَةُ عِندَ اللَّهِ خَالِصَةً مِّن دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ

Verse 94 (Hindi):
कहो: “अगर तुम्हारे पास अल्लाह के यहाँ दूसरा घर बिल्कुल साफ हो, लोगों के बिना, तो तुम मौत की इच्छा करो, अगर तुम सच्चे हो।”

Verse 94 (English):
Say: “If the abode of the Hereafter with Allah is indeed for you specially and not for others, then long for death if you are truthful.”

Verse 95 (Arabic):
وَلَن يَتَمَنَّوْهُ أَبَدًا بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ

Verse 95 (Hindi):
और वह कभी इसकी इच्छा नहीं करेंगे, अपने हाथों द्वारा जो कुछ वह पहले भेज चुके हैं। और अल्लाह जानता है जो ज़ालिम हैं।

Verse 95 (English):
Never will they wish for it (death) because of what their hands have sent before them (i.e. what they have done). And Allah is Aware of the wrongdoers.

Verse 95 (Arabic):
وَلَتَجِدَنَّهُمْ أَحْرَصَ النَّاسِ عَلَىٰ حَيَاةٍ وَمِنَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا ۚ يَوَدُّ أَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ أَلْفَ سَنَةٍ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِهِ مِنَ الْعَذَابِ أَن يُعَمَّرَ ۗ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ

Verse 95 (Hindi):
तुम उन्हें हमेशा इस बात के लिए सबसे ज्यादा दृढ़ मानोगे कि वे जीवित रहें, और जो लोग शिरक करते हैं, उनमें से भी किसी को चाहिए कि उसे हज़ार साल की उम्र हो, वह उनके अज़ाब से बचा नहीं सकेगा। और अल्लाह उनके कामों को देख रहा है।

Verse 95 (English):
And you will surely find them the most greedy of people for life – [even] more than those who associate others with Allah. One of them wishes that he could be granted life a thousand years, but it would not remove him in the least from the [coming] punishment that he should be granted life. And Allah is Seeing of what they do.

Verse 96 (Arabic):
قُلْ مَن كَانَ عَدُوًّا لِّجِبْرِيلَ فَإِنَّهُ نَزَّلَهُ عَلَىٰ قَلْبِكَ بِإِذْنِ اللَّهِ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ

Verse 96 (Hindi):
कहो: “जो जिब्रील का दुश्मन हो, तो उसको यह जान लो कि अल्लाह ने उसे तुम्हारे दिल पर उतारा है, अल्लाह की इज़ाज़त से, जो कुरान की पुष्टि करता है, और उससे पहले जो था। और यह मुमिनों के लिए राह दिखाने वाला और ख़ुशख़बरी है।”

Verse 96 (English):
Say, “Whoever is an enemy to Gabriel – it is [none but] he who has brought the Qur’an down upon your heart, [O Muhammad], by permission of Allah, confirming that which was before it and as guidance and good tidings for the believers.”

Verse 97 (Arabic):
مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَافِرِينَ

Verse 97 (Hindi):
जो अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसके रसूलों, जिब्रील और मीकाइल के दुश्मन हो, तो जान लो कि

English Translation:

Whoever is the enemy of Allah, His angels, His messengers, Jibril and Michael, then know that

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 98 to 102, in Hindi and English:

Verse 98 (Arabic):
مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَالْجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَافِرِينَ

Verse 98 (Hindi):
जो अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसके रसूलों, जिब्रील और मीकाइल के दुश्मन हो, तो जान लो कि अल्लाह काफ़िरों का दुश्मन है।

Verse 98 (English):
Whoever is an enemy to Allah and His angels and His messengers and Gabriel and Michael – then indeed, Allah is an enemy to the disbelievers.

Verse 99 (Arabic):
وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا إِلَّا الْفَاسِقُونَ

Verse 99 (Hindi):
हमने तुम्हारे पास स्पष्ट आयातें उतारी हैं, और उन्हें तो बस फासिक ही नहीं मानते।

Verse 99 (English):
And We have certainly revealed to you verses [which are] clear proofs, and no one would deny them except the defiantly disobedient.

Verse 100 (Arabic):
أَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَّبَذَهُ فَرِيقٌ مِّنْهُم بَلِ الْأَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ

Verse 100 (Hindi):
क्या हर बार जब वे किसी प्रतिज्ञा का करते हैं, तो उसको कुछ लोग उसे तोड़ देते हैं? हाँ, बल्कि ज्यादातर लोग ईमान नहीं लाते।

Verse 100 (English):
Do they not know that whoever opposes Allah and His Messenger – that for him is the fire of Hell, wherein he will abide eternally? That is the great disgrace.

Verse 101 (Arabic):
وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

Verse 101 (Hindi):
और जब उनके पास अल्लाह के हुक़्म के साथ से कोई रसूल आया, तो उन लोगों में से जो कुरान की और उन्हें भी दी गई थी, क

English Translation :

And when a messenger came to them with the command of Allah, from among those who were given the Quran,

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 101 to 105, in Hindi and English:

Verse 101 (Arabic):
وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

Verse 101 (Hindi):
और जब उनके पास अल्लाह के हुक़्म के साथ से कोई रसूल आया, तो उन लोगों में से जो कुरान की और उन्हें भी दी गई थी, कुरान को अपने पीछे फेंक दिया, जैसे कि वे नहीं जानते थे।

Verse 101 (English):
And when there came to them a messenger from Allah confirming that which was with them, a party of those who had been given the Scripture threw the Scripture of Allah behind their backs as if they did not know [what it contained].

Verse 102 (Arabic):
وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُو الشَّيَاطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَانَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَانُ وَلَٰكِنَّ الشَّيَاطِينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَ وَمَا أُنزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَا إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ ۚ وَمَا هُم بِضَارِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرَاهُ مَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ

Verse 102 (Hindi):
और उन्होंने वही बातें अपने माने, जो दिवालिया ने पढ़ाई थी। और सुलेमान ने क़ुरान को नहीं अस्तबाल किया था, बल्कि दिवालियों ने अस्तबाल किया था। वे लोग लोगों को जादू सिखाते थे और बाबिल के दो राजा हारूत और मारूत के पास उतारा गया था। वे लोग किसी को जादू सिखाते नहीं थे, जब तक कि उन्होंने कहा कि हम सिर्फ तुम्हारी परीक्षा हैं, इसलिए ईमान न छोड़ो। और उनमें से दोनों पति-पत्नी के बीच कोई बात नहीं बताते, वे लोग किसी को भी उस जादू से नुक़सान नहीं पहुंचा सकते थे, यह उनका बाप अल्लाह के इज़न के बिना नहीं होता था। और वे

Apologies for the oversight. Here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 103 to 106:

Verse 103 (Arabic):
وَلَقَدْ عَلِمُوا مَنِ اشْتَرَاهُ مَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ

Verse 103 (Hindi):
और उन्हें यह भी मालूम है जो उसको ख़रीदता है, उसके पास आने वाली ज़िन्दगी में कोई भी दिमाग़ी ख़ुशी नहीं है, और वह क्या बुरी ख़रीद है, जो उन्होंने अपने आप से की है! अगर वह यह समझते!

Verse 103 (English):
And they have known the buyer thereof. Alas for what they have sold their souls! That they should disbelieve in that which Allah hath revealed, grudging that Allah should reveal of His bounty unto whom He will of His bondmen. They have incurred anger upon anger. For disbelievers is a shameful doom.

Verse 104 (Arabic):
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا نُؤْمِنُ بِمَا أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَاءَهُ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنبِيَاءَ اللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 104 (Hindi):
और जब उनको कहा जाता है कि अल्लाह ने उतारा है, तो वे कहते हैं कि हम उस से क्या नहीं मांगते जो हमारी पूरी चाहत हो। उनको उसके गोपन में उतारा है, जो वे नहीं जानते। कहो तुम लोगों ने अल्लाह के नबीयों को पहले क्यों मार डाला, अगर तुम मोमिन हो?

Verse 104 (English):
And when it is said unto them: Believe in that which Allah hath revealed, they say: We believe in that which was revealed unto us. And they disbelieve in that which cometh after it, though it is the truth confirming that which they possess. Say (unto them, O Muhammad): Why then slew ye the prophets of Allah aforetime, if ye are (indeed) believers?

Verse 105 (Arabic):
وَلَقَدْ جَاءَكُم مُّوسَىٰ بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِن بَعْدِهِ وَأَنتُمْ ظَالِمُونَ

Verse 105 (Hindi):
और मूसा ने तो तुम्हारे सामने सबूतों के साथ आ गए थे, फिर भी तुमने उसके बाद गैर अधिकारी होकर गैल मूसा को चीज़ेँ बनाने लगे।

Verse 105 (English):
And verily Moses came unto you with clear proofs (of Allah’s Sovereignty), yet, while he was away, ye chose the calf (for worship) and ye were wrong-doers.

Verse 106 (Arabic):
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ الطُّورَ خُذُوا مَا آتَيْنَاكُم بِقُوَّةٍ وَاسْمَعُوا ۖ قَالُوا سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ ۚ قُل بِئْسَمَا يَأْمُرُكُم بِهِ إِيمَانُكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 106 (Hindi):
और [याद करो] जब हमने तुम्हारा अहद लिया और तुम्हारे ऊपर पहाड़ खड़ा कर दिया, [कहते हुए], “जो कुछ हमने तुम्हें दिया है उसे दृढ़ निश्चय के साथ ले लो और सुनो।” उन्होंने कहा, “हमने सुना और अवज्ञा की।” और उनके अविश्वास के कारण उनका हृदय बछड़े के प्रेम से भर गया। कहो, “क्या बुरा है वह चीज़ जो तुम्हारा ईमान तुम्हें आदेश देता है, यदि तुम ईमानवाले हो।”

English Translation :

And [remember] when We took your covenant and We raised over you the Mount, [saying], “Take what We have given you with determination and listen.” They said, “We have heard and disobeyed.” And their hearts were filled with the love of the calf because of their disbelief. Say, “How evil is that which your faith commands you, if you should be believers.”

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 107 to 111, in Hindi and English:

Verse 107 (Arabic):
أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ

Verse 107 (Hindi):
क्या तुम नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन का हुक़्म तो अल्लाह का ही है, और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई दोस्त और नासीर नहीं है।

Verse 107 (English):
Knowest thou not that unto Allah belongeth the Sovereignty of the heavens and the earth? And besides Allah ye have neither patron nor helper.

Verse 108 (Arabic):
أَمْ تُرِيدُونَ أَن تَسْأَلُوا رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ الْكُفْرَ بِالْإِيمَانِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاءَ السَّبِيلِ

Verse 108 (Hindi):
क्या तुम अपने रसूल से वही सवाल करना चाहते हो, जो लोग मूसा से पहले कर चुके थे? जो कोई क़ुफ़्र को ईमान में बदल दे, वह बिल्कुल ग़लत रास्ते पर चला जाता है।

Verse 108 (English):
Would ye question your messenger as Moses was questioned aforetime? He who chooseth disbelief instead of faith, verily he hath gone astray from a plain road.

Verse 109 (Arabic):
وَدَّ كَثِيرٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يَرُدُّونَكُم مِّن بَعْدِ إِيمَانِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًا مِّنْ عِندِ أَنفُسِهِم مِّن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْحَقُّ ۖ فَاعْفُوا وَاصْفَحُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

Verse 109 (Hindi):
बहुत से किताब के लोग चाहते हैं कि तुम अपने ईमान के बाद क़ुफ़्र में लौट आओ, ईर्ष्या के साथ, अपने ही नफ़सों के कारण, जबकि उनके लिए सच्चाई का पता चल चुका है। सच्चाई के प्रकट होने के बाद, तुम्हें उन्हें माफ़ कर देना और माफ़ कर देना चाहिए, जब तक अल्लाह अपना हुक़्म न आए। बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।

Verse 109 (English):
Many of the people of the Scripture long to make you disbelievers after your belief, through envy on their own account, after the truth hath become manifest unto them. Forgive and be indulgent (toward them) until Allah give command. Lo! Allah is Able to do all things.

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 110 to 115:

Verse 110 (Arabic):
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِندَ اللَّهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ

Verse 110 (Hindi):
और नमाज़ पढ़ो और जकात दो, और जो भलाई तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसे तुम अल्लाह के पास ही पाओगे। बेशक अल्लाह तुम्हारे कामों को देख रहा है।

Verse 110 (English):
And establish prayer and give zakah, and whatever good you put forward for yourselves – you will find it with Allah. Indeed, Allah of what you do, is Seeing.

Verse 111 (Arabic):
وَقَالُوا لَن يَدْخُلَ الْجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوْ نَصَارَىٰ ۗ تِلْكَ أَمَانِيُّهُمْ ۗ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ

Verse 111 (Hindi):
और वे कहते हैं कि सिवाई उन्होंने जो हूद धर्म माना हो या नसरानियों के, कोई जन्नत में नहीं जाएगा। यह उनकी ख़्वाहिशें हैं। कहो: “अगर तुम सच्चे हो, तो तुम्हारे सबूत लाओ।”

Verse 111 (English):
And they say, “None will enter Paradise except one who is a Jew or a Christian.” That is [merely] their wishful thinking, Say, “Produce your proof, if you should be truthful.”

Verse 112 (Arabic):
بَلَىٰ مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُ أَجْرُهُ عِندَ رَبِّهِ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

Verse 112 (Hindi):
हाँ, जो अपना चेहरा अल्लाह की ओर मोड़ता है और वह नेक काम करता है, उसका उसके परवरदिगार के पास बदला है, और उन्हें डर भी नहीं होगा और न ही वे ग़मगीन होंगे।

Verse 112 (English):
Yes, [on the contrary], whoever submits his face in Islam to Allah while being a doer of good will have his reward with his Lord. And no fear will there be concerning them, nor will they grieve.

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 113 to 116:

Verse 113 (Arabic):
وَقَالَتِ الْيَهُودُ لَيْسَتِ النَّصَارَىٰ عَلَىٰ شَيْءٍ وَقَالَتِ النَّصَارَىٰ لَيْسَتِ الْيَهُودُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَهُمْ يَتْلُونَ الْكِتَابَ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ ۚ فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ

Verse 113 (Hindi):
और यहूदियों बोलते हैं कि नसारी किसी बात पर काम नहीं आते, और नसारी बोलते हैं कि यहूदी किसी बात पर काम नहीं आते, और ये लोग तो किताब पढ़ रहे हैं। इसी तरह जैसे उन लोगों का कहना जो जानते ही नहीं। ऐसे लोगों के बातों की तरह खुदा करेगा जिनमें दिन लोगों के बीच क़यामत के दिन जिन बातों में वे भिन्न होते थे।

Verse 113 (English):
The Jews say, “The Christians have nothing [true] to stand on,” and the Christians say, “The Jews have nothing to stand on,” although they [both] recite the Scripture. Thus the polytheists speak the same as their words. But Allah will judge between them on the Day of Resurrection concerning that over which they used to differ.

Verse 114 (Arabic):
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَاجِدَ اللَّهِ أَن يُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ وَسَعَىٰ فِي خَرَابِهَا ۚ أُولَٰئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَن يَدْخُلُوهَا إِلَّا خَائِفِينَ ۚ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ

Verse 114 (Hindi):
और कौन उससे ज़्यादा ज़ालिम हो सकता है जो अल्लाह की मस्जिदों से लोगों को धिक्कारने की इज़ाज़त नहीं देता, जिनमें अल्लाह का नाम लिया जाता है और उनके धर्मार्थ के लिए उनकी हालत सुधारने का काम करता है। ये लोग मस्जिदों में प्रवेश करने के लायक़ नहीं हैं, सिवाए डरते हुए। उनको दुनियाँ में शर्म और आख़िरत में बड़ा अज़ाब होगा।

Verse 114 (English):
And who are more unjust than those who prevent the name of Allah from being mentioned in His mosques and strive toward their destruction. It is not for them to enter them except in fear. For them in this world is disgrace, and they will have in the Hereafter a great punishment.

Verse 115 (Arabic):
وَلِلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ ۚ فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ وَاسِعٌ عَلِيمٌ

Verse 115 (Transliteration):
Wa lillahi al-mashriqu wal-maghribu fa-aynama tuwallu fa-thamma wajhullahi, inna Allaha wasi’un ‘aleem.

Verse 115 (English):
To Allah belongs the east and the west. So wherever you [might] turn, there is the Face of Allah. Indeed, Allah is all-Encompassing and Knowing.

Verse 116 (Arabic):
وَقَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا ۗ سُبْحَانَهُ ۖ بَل لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ كُلٌّ لَّهُ قَانِتُونَ

Verse 116 (Transliteration):
Wa qaloo ittakhatha Allahu waladan, subhanahu, bal lahu ma fi as-samawati wal-ardi, kullun lahu qanitoon.

Verse 116 (English):
And they say, “Allah has taken a son.” Exalted is He! Rather, to Him belongs whatever is in the heavens and the earth. All are devoutly obedient to Him,

Verse 117 (Arabic):
بَدِيعُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَإِذَا قَضَىٰ أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُن فَيَكُونُ

Verse 117 (Transliteration):
Badee’u as-samawati wal-ardi, wa idha qada amran fa-innama yaqoolu lahu kun fayakoon.

Verse 117 (English):
Originator of the heavens and the earth. When He decrees a matter, He only says to it, “Be,” and it is.

Verse 118 (Arabic):
وَقَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا اللَّهُ أَوْ تَأْتِينَا آيَةٌ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ ۘ تَشَابَهَتْ قُلُوبُهُمْ ۗ قَدْ بَيَّنَّا الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ

Verse 118 (Transliteration):
Wa qala allatheena la ya’lamoon, lawla yukallimuna Allahu aw tateena ayatun, kathalika qala allatheena min qablihim mithla qawlihim, tashabaha quloobuhum, qad bayyanna al-ayati li-qawmin yooqinoon.

Verse 118 (English):
And those who do not know say, “Why does Allah not speak to us or there come to us a sign?” Thus spoke those before them like their words. Their hearts resemble each other. We have shown clearly the signs to a people who are certain [in faith].

Certainly, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 118 to 220:

Verse 118 (Arabic):
وَقَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا اللَّهُ أَوْ تَأْتِينَا آيَةٌ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ ۘ تَشَابَهَتْ قُلُوبُهُمْ ۗ قَد بَيَّنَّا الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ

Verse 118 (Hindi):
और उन लोगों ने कहा जिनको ज़्यादा नहीं पता, क्यों हमसे खुदा बोलता नहीं या हमारे पास कोई आयत नहीं आती? वैसे ही कहते हैं जिनके पास इनसे पहले था, उनका कहना उनके तर्जुमान समान होता है। उनके दिल एक जैसे होते हैं। हमने तो वहाँ लोगों के लिए सबूत पेश कर दिए हैं जो पक्की इमान रखते हैं।

Verse 118 (English):
And those who have no knowledge say, “Why does Allah not speak to us or there come to us a sign?” Thus spoke those before them like their words. Their hearts resemble each other. We have shown clearly the signs to a people who are certain [in faith].

Verse 119 (Arabic):
إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَشِيرًا وَنَذِيرًا ۖ وَلَا تُسْأَلُ عَنْ أَصْحَابِ الْجَحِيمِ

Verse 119 (Hindi):
हमने तुम्हें सच्चाई के साथ (दीन) के लिए भेजा है, ख़ुशख़बर देने वाला और चेताने वाला, और तुम्हें जहन्नुम के वासियों की क़हानी नहीं सुनाई जाएगी।

Verse 119 (English):
Indeed, We have sent you, [O Muhammad], with the truth as a bringer of good tidings and a warner. And you will not be asked about the companions of Hellfire.

Verse 120 (Arabic):
وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصَارَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدَىٰ ۗ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَ الَّذِي جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ ۙ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ

Verse 120 (Hindi):
और न तुम यहूदियों से खुश होंगे और न ही नसारी, जब तक तुम उनके धर्म का पालन न करो। कहो: “अल्लाह का हुदा ही हुदा है, और अगर तुम उनकी ख़्वाहिशों का पालन करोगे उस विद्या के बाद जो तुम पर आया है, तो तुम्हारे लिए अल्लाह का कोई दोस्त और न ही कोई हेल्पर होगा।

Verse 120 (English):
Never will the Jews nor the Christians be pleased with you until you follow their religion. Say, “Indeed, the guidance of Allah is the [only] guidance.” If you were to follow their desires after what has come to you of knowledge, you would have against Allah no protector or helper.

Verse 121 (Arabic):
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَٰئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ

Verse 121 (Hindi):
जिन्हें हमने यह किताब दी, वे उसे सच्ची तिलावत के साथ पढ़ते हैं, उन्हीं में यह किताब मानने वाले हैं। और जो इसे नकारें, वे ही नुकसान में हैं।

Verse 121 (English):
Those to whom We have given the Book recite it with its true recital. They [are the ones who] believe in it. And whoever disbelieves in it – it is they who are the losers.

Verse 122 (Arabic):
يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّتِي أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ

Verse 122 (Hindi):
हे इस्राइलियों! मेरी वह नेमत याद करो जो मैंने तुम पर निशानादर हासिल की और मैंने तुम्हें सभी ज़माने के लोगों के मुक़ाबले अधिक तर की यहाँ तक कि अल्लाह ताला ने तुम्हें अपनी ख़ास रहमत और नेमत से आबाद किया।

Verse 122 (English):
O Children of Israel, remember My favor that I have bestowed upon you and that I preferred you over the worlds.

Verse 123 (Arabic):
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَّا تَجْزِي نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْئًا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ

Verse 123 (Hindi):
और उस दिन का ख़ुदा खौफ खाओ जब एक नफ़र दूसरे नफ़र के लिए कुछ भी फ़ाइदा नहीं लाएगा, न उसका कोई इंसाफ़ किया जाएगा, और न ही उसकी बेहतरी लाएगी और न ही किसी की दुआ से कुछ होगा। और न ही उनको मदद मिलेगी।

Verse 123 (English):
And fear a Day when no soul will suffice for another soul at all, nor will intercession be accepted from it, nor will compensation be taken from it, nor will they be aided.

Verse 124 (Arabic):
وَإِذِ ابْتَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ

Verse 124 (Hindi):
और जब इब्राहीम को उसके परवरदिगार ने अल्लाह के इर्शाद के शर्त पर आज़माया, और उसने उन्हें पूरा किया, तो अल्लाह ने उससे कहा, “मैं तुझे लोगों के लिए एक आगू बना रहा हूँ।” उसने कहा, “और मेरी वंशावली से?” उसने कहा, “मेरा वादा सब पापियों को नहीं पहुंचेगा।”

Verse 124 (English):
And [mention, O Muhammad], when Abraham was tried by his Lord with commands and he fulfilled them.

Verse 125 (Arabic):
وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا وَاتَّخِذُوا مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى ۖ وَعَهِدْنَا إِلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْعَاكِفِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ

Verse 125 (Hindi):
और जब हमने बैतुल खला को लोगों के लिए मेहमानगीरी का स्थान और सुरक्षा का स्थान बनाया, तब तुम लोग इब्राहीम के स्थान को नमाज़ का स्थान बना लिया करो, और हमने इब्राहीम और इस्माईल से क़सम ख़ाई कि वे मेरे घर को तहारत में रखें, जिन लोगों की ताओं या मूठियों या जोड़ों या नमाज़ करनेवालों की राह बंद हो, उनके लिए।

Verse 125 (English):
And [mention] when We made the House a place of return for the people and [a place of] security. And take, [O believers], from the standing place of Abraham a place of prayer. And We charged Abraham and Ishmael, [saying], “Purify My House for those who perform Tawaf and those who are staying [there] for worship and those who bow and prostrate [in prayer].”

Verse 126 (Arabic):
وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَٰذَا بَلَدًا آمِنًا وَارْزُقْ أَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ آمَنَ مِنْهُم بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُ إِلَىٰ عَذَابِ النَّارِ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ

Verse 126 (Hindi):
और जब इब्राहीम ने कहा, “हे परवरदिगार! इस शहर को सुरक्षित बना दो, और इसके लोगों को उन फलों से रोज़ी देना जो उनमें से वह लोग हैं जिन्होंने अल्लाह और आख़िरत पर ईमान लाए।” उसने कहा, “और जो कुफ़र करेगा, मैं उसे थोड़ा सा भोजन दूँगा, फिर मैं उसे आग के अज़ाब में ज़रा सा ख़ाली कर दूँगा, और वास्ते में यह काफ़िरों का बुरा अंजाम है।”

Verse 126 (English):
And [mention] when Abraham said, “My Lord, make this a secure city and provide its people with fruits – whoever of them believes in Allah and the Last Day.” [ Allah ] said, “And whoever disbelieves – I will grant him enjoyment for a little; then I will force him to the punishment of the Fire, and wretched is the destination.”

Verse 127 (Arabic):
وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَاهِيمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَإِسْمَاعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا ۖ إِنَّكَ أَنتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ

Verse 127 (Hindi):
और जब इब्राहीम और इस्माईल ने ख़ाने की दीवारें बनाईं, तो उन्होंने कहा, “हमारे रब! हमारी इस नमाज़ को स्वीकार करो। तू ही सुननेवाला, जाननेवाला है।”

Verse 127 (English):
And [mention] when Abraham was raising the foundations of the House and [with him] Ishmael, [saying], “Our Lord, accept [this] from us. Indeed You are the Hearing, the Knowing.

Verse 128 (Arabic):
رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَا أُمَّةً مُّسْلِمَةً لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ

Verse 128 (Hindi):
हे हमारे रब! हमें दोनों को अपना आबेद बना और हमारे वंशजों को भी तेरे लिए एक आबेद बना और हमें हमारे इबादत के तमाम रसमों का अदाना-प्रदान दिखा, और हमारे पास तोबा कर दे। बेशक तू ही तोबा करने वाला, दयालु है।

Verse 128 (English):
Our Lord, and make us Muslims [in submission] to You and from our descendants a Muslim nation [in submission] to You. And show us our rites and accept our repentance. Indeed, You are the Accepting of repentance, the Merciful.

Verse 129 (Arabic):
رَبَّنَا وَابْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ

Verse 129 (Hindi):
हे हमारे रब! उनमें से उनके लिए एक दूत भेज, जो उनके सामने तेरे आयात पढ़े, और उन्हें किताब और हिकमत की सिखायात दे, और उनकी तहारत करे। बेशक, तू ही अज़ीज और बुद्धिमान है।

Verse 129 (English):
Our Lord, and send among them a messenger from themselves who will recite to them Your verses and teach them the Book and wisdom and purify them. Indeed, You are the Exalted in Might, the Wise.

Verse 130 (Arabic):
وَمَن يَرْغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبْرَاهِيمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفْسَهُ ۚ وَلَقَدِ اصْطَفَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ

Verse 130 (Hindi):
और जो कोई इब्राहीम की शरीयत की पीछे होकर दूसरी शरीयत की तरफ़ जाता है, सिवाय उसके कि जो ख़ुद को मूर्ख समझता है। हमने तो उसे दुनिया में चुन लिया है, और बेशक वह आख़िरत में भी सालिहीन में से होगा।

Verse 130 (English):
But who would be averse to the religion of Abraham except one who makes a fool of himself. And We had chosen him in this world, and indeed he, in the Hereafter, will be among the righteous.

Verse 131 (Arabic):
إِذْ قَالَ لَهُ رَبُّهُ أَسْلِمْ ۖ قَالَ أَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ

Verse 131 (Hindi):
जब उसका परवरदिगार ने उससे कहा कि तुम अर्जुन करो, तो उसने कहा, “मैं उन लोगों के परवरदिगार के लिए अर्जुन कर चुका हूँ।”

Verse 131 (English):
When his Lord said to him, “Submit”, he said “I have submitted [in Islam] to the Lord of the worlds.”

Verse 132 (Arabic):
وَوَصَّىٰ بِهَا إِبْرَاهِيمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَىٰ لَكُمُ الدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ

Verse 132 (Hindi):
और इब्राहीम ने अपने बच्चों को भी इसी बात पर नसीहत दी थी, और याकूब ने भी, “हे बच्चों! यक़ीनन, अल्लाह ने तुम्हारे लिए धर्म को चुना है, तो तुम इसलिए मरोगे कि तुम मुस्लिम हो।”

Verse 132 (English):
And Abraham instructed his sons [to do the same] and [so did] Jacob, [saying], “O my sons, indeed Allah has chosen for you this religion, so do not die except while you are Muslims.”

Verse 133 (Arabic):
أَمْ كُنتُمْ شُهَدَاءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ الْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِن بَعْدِي قَالُوا نَعْبُدُ إِلَٰهَكَ وَإِلَٰهَ آبَائِكَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ إِلَٰهًا وَاحِدًا وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ

Verse 133 (Hindi):
क्या तुम लोग उस समय नहीं थे जब याकूब के समय मौत आई थी, और उसने अपने बच्चों से कहा, “मेरे बाद तुम किसकी पूजा करोगे?” उन्होंने कहा, “हम तेरे और तेरे पूर्वजों के अल्लाह की पूजा करते हैं, जैसे कि इब्राहीम, इस्माईल और इसहाक के अल्लाह की, वह एक अल्लाह है और हम उसके ही मुसलमान हैं।”

Verse 133 (English):
Were you not when death came to Jacob, and he said to his children, “Whom will you worship after me?” They said, “We worship the Allah of you and your ancestors, like the Allah of Abraham, Ishmael and Isaac; He is one Allah and we are Muslims of Him.”

Verse 134 (Arabic):
تِلْكَ أُمَّةٌ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْأَلُونَ عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ

Verse 134 (Hindi):
यह एक उम्मत है, जो चली गई है, उसे उसके किए हुए फल मिलेंगे, और तुम्हें तुम्हारे किए हुए फल मिलेंगे। और तुम्हें उनके कामों के बारे में नहीं पूछा जायेगा।

Verse 134 (English):
That was a nation which has passed on. It will have [the consequence of] what it earned, and you will have what you have earned. And you will not be asked about what they used to do.

Verse 135 (Arabic):
وَقَالُوا كُونُوا هُودًا أَوْ نَصَارَىٰ تَهْتَدُوا ۗ قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ

Verse 135 (Hindi):
और लोग कहते हैं कि तुम हूदी बनो या नसरानी बनो ताकि तुम सीधी राह पर चलो। कहो, बिल्कुल नहीं, हम तो इब्राहीम की शरीयत के अनुसार हनीफ हैं, और हम उन मुशरीकों में से नहीं हैं।

Verse 135 (English):
And they say, “Be Jews or Christians [so] you will be guided.” Say, “Rather, [we follow] the religion of Abraham, inclining toward truth, and he was not of the polytheists.”

Verse 136 (Arabic):
قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ إِلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَا أُوتِيَ النَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ

Verse 136 (Hindi):
कहो, “हम तो अल्लाह पर ईमान लाए हैं, और उस पर जो हम पर नाज़िल हुआ, और उस पर जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक, याकूब और उनके बेटों को नाज़िल हुआ, और उस पर जो मूसा, ईसा और अन्य नबीयों को उनके परवरदिगार ने दिया, हम उनमें से किसी को भी अलग नहीं करते और हम उसी के मुसलमान हैं।”

Verse 136 (English):
Say, [O believers], “We have believed in Allah and what has been revealed to us and what has been revealed to Abraham and Ishmael and Isaac and Jacob and the Descendants and what was given to Moses and Jesus and what was given to the prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and we are Muslims [submitting] to Him.”

Verse 137 (Arabic):
فَإِنْ آمَنُوا بِمِثْلِ مَا آمَنتُم بِهِ فَقَدِ اهْتَدَوا ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا هُمْ فِي شِقَاقٍ ۖ فَسَيَكْفِيكَهُمُ اللَّهُ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ

Verse 137 (Hindi):
अगर उन्होंने वही ईमान लाया जिस पर तुम लोग आयम हो, तो वह सचमुच सीधी राह में हो चु

English Translation :

If they believe in the same faith as you, then they are truly on the right path.

Verse 138 (Arabic):
صِبْغَةَ اللَّهِ ۗ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ صِبْغَةً ۖ وَنَحْنُ لَهُ عَابِدُونَ

Verse 138 (Hindi):
यह अल्लाह का सीरा है। और अल्लाह का सीरा कौन अच्छा कर सकता है? और हम तो उसी के लिए अबेद हैं।

Verse 138 (English):
[That is a] true promise [binding] upon Him in the Torah and the Gospel and the Qur’an. And who is truer to his covenant than Allah? So rejoice in your transaction which you have contracted. And it is that which is the great attainment.

Verse 139 (Arabic):
قُلْ هَلْ تُحَاجُّونَنَا فِي اللَّهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ وَلَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ ۖ وَنَحْنُ لَهُ مُخْلِصُونَ

Verse 139 (Hindi):
कहो, “क्या तुम हमसे अल्लाह के बारे में विवाद करोगे? जबकि वह हमारा और तुम्हारा रब है, और हमारे काम हमारे हैं और तुम्हारे काम तुम्हारे हैं। और हम तो उसके लिए खुलासा करनेवाले हैं।”

Verse 139 (English):
Say, “Do you argue with us about Allah while He is our Lord and your Lord? For us are our deeds, and for you are your deeds. And we are sincere [in deed and intention] to Him.”

Verse 140 (Arabic):
أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِbrَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطَ كَانُوا هُودًا أَوْ نَصَارَىٰ ۗ قُلْ أَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ اللَّهُ ۗ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَادَةً عِندَهُ مِنَ اللَّهِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ

Verse 140 (Hindi):
क्या तुम कहोगे कि इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक, याकूब और उनके असबात हूदी थे या नसरानी? कहो, “क्या तुम्हें अधिक जानकारी है, या अल्लाह को?” और उससे किससे ज़ियादा ज़ुल्म हो सकता है जो उसके पास अल्लाह की गवाही छुपा रखता है? और अल्लाह तुम्हारे कामों को नहीं भूलता।

Verse 141 (Arabic):
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ۖ فَإِن يَكْفُرْ بِهَا هَٰؤُلَاءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًا لَّيْسُوا بِهَا بِكَافِرِينَ

Verse 141 (Hindi):
ये वह लोग हैं जिन्हें हमने किताब, हिकमत और नबुव्वत दी थी। अगर वह लोग उसे नकारते हैं, तो हमने उसे उन लोगों के हाथों में दिया है, जो उसकी तक़दीर नहीं।

Verse 141 (English):
Those are the ones We gave the Book, the Judgment, and the Prophethood. But if they disbelieve in it, then indeed We will entrust it to a people who are not therein disbelievers.

Verse 142 (Arabic):
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَى اللَّهُ ۖ فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهْ ۗ قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْعَالَمِينَ

Verse 142 (Hindi):
वह लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने हदायत दी, इसलिए उनकी हदायत के अनुसार ही तुम चलो। कहो, मैं तुमसे उसका कोई आज़र नहीं माँगता, यह तो सब लोगों के लिए एक सबक है।

Verse 142 (English):
Those are the ones whom Allah has guided, so from their guidance take an example. Say, “I ask of you for this message no payment. It is not but a reminder for the worlds.”

Verse 143 (Arabic):
وَقَالُوا لَن تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَّعْدُودَةً ۚ قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِندَ اللَّهِ عَهْدًا فَلَن يُخْلِفَ اللَّهُ عَهْدَهُ ۖ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ

Verse 143 (Hindi):
और वह कहते हैं कि हम पर आग को कुछ नहीं छूएगा, बस कुछ दिनों के लिए ही। कहो, क्या तुम अल्लाह के साथ वादा किया है, तो अल्लाह अपने वादे को नहीं तोड़ेगा। या तुम उन बातों पर वादा कर रहे हो, जिनका तुम्हें कुछ पता ही नहीं?

Verse 143 (English):
And they said, “Never will the Fire touch us, except for a few days.” Say, “Have you taken a covenant with Allah? For Allah will never break His covenant. Or do you say about Allah that which you do not know?”

Verse 144 (Arabic):
بَلَىٰ مَن كَسَبَ سَيِّئَةً وَأَحَاطَتْ بِهِ خَطِيئَتُهُ فَأُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

Verse 144 (Hindi):
हाँ, जो बुराई करेगा, और उसकी बुराई उसको घेर लेगी, वही लोग आग के लोग होंगे, वे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे।

Verse 144 (English):
Yes, [on the contrary], whoever earns evil and his sin has encompassed him – those are the companions of the Fire; they will abide therein eternally.

Verse 145 (Arabic):
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَنَبْلُوكُم بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً ۖ وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ

Verse 145 (Transliteration):
Kullu nafsin dhaa’iqatu almawti wananablokum bishsharri waalkhayri fitnatan wa-ilayna turja’oon.

Verse 145 (Hindi):
हर आत्मा मौत का चाखने वाली है, और हम तुम्हें बुराई और अच्छाई के साथ परीक्षण में डालते हैं; और तुम्हें हमारी ओर लौटाया जायेगा।

Verse 146 (Arabic):
وَإِذَا رَآكَ الَّذِينَ كَفَرُوا يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا الَّذِي يَذْكُرُ آلِهَتَكُمْ وَهُم بِذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ هُمْ كَافِرُونَ

Verse 146 (Transliteration):
Wa-itha raaka allatheena kafaroo yattakhithoonaka illa huzwan ahaatha allathee yathkuru alihatakum wahum bithikri alrrahmani hum kafiroon.

Verse 146 (Hindi):
और जब वे काफिर लोग तुम्हें देखते हैं, तो वे तुम्हें मज़ाक बनाते हैं, (कहते हैं) क्या यही वह है जो तुम्हारी देवताओं की स्मृति कराता है? और वे रहमान की स्मृति के साथ काफिर हैं।

Verse 147 (Arabic):
خُلْدُونَ

Verse 147 (Transliteration):
Khuldoon.

Verse 147 (Hindi):
वे हमेशा के लिए रहेंगे।

Verse 148 (Arabic):
تَبَارَكَ الَّذِي إِن شَاءَ جَعَلَ لَكَ خَيْرًا مِّن ذَٰلِكَ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ وَيَجْعَل لَّكَ قُصُورًا

Verse 148 (Transliteration):
Tabaraka allathee in shaa jaAAala laka khayran min thalika jannatin tajree min tahtiha al-anharu wayajAAal laka qusooran.

Verse 148 (Hindi):
महान है वह जो, यदि वह चाहे, तुम्हारे लिए उससे अच्छा बना दे – बाग़ों को, जिन के नीचे नदियाँ बहती हों, और तुम्हारे लिए महल बना दे।

Verse 149 (Arabic):
وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن يُدْخِلُ مَن يَشَاءُ فِي رَحْمَتِهِ ۚ وَالظَّالِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ

Verse 149 (Transliteration):
और यदि अल्लाह चाहता तो उन्हें एक ही धर्म का बना लेता, परन्तु वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता में प्रवेश कर लेता है। और ज़ालिमों का कोई संरक्षक या सहायक नहीं होता।

Verse 149 (English):
And if Allah had willed, He could have made them [of] one religion, but He admits whom He wills into His mercy. And the wrongdoers have not any protector or helper.

Verse 150 (Arabic):
قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِالْبَاقِيَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ يَصْدَفُونَ

Verse 150 (Transliteration):
Qad khasira allatheena kaththaboo bilbaqiyyati alddunya wahum yasdafoon.

Verse 150 (English):
जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों और (उससे मुलाक़ात) को झुठलाया, वे दुनिया और आख़िरत से हारे हुए हैं। और उनके पास उसकी ओर से कोई सहायक न होगा।

Verse 151 (Arabic):
وَاسْتَبْشِرُوا بِالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَلَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ كُلَّمَا رُزِقُوا مِنْهَا مِن ثَمَرَةٍ رِّزْقًا ۙ قَالُوا هَٰذَا الَّذِي رُزِقْنَا مِن قَبْلُ وَأُتُوا بِهِ مُتَشَابِهًا ۖ وَلَهُمْ فِيهَا أَزْوَاجٌ مُّطَهَّرَةٌ ۖ وَهُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

Verse 151in hindi (Transliteration):
और जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, उन्हें शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए स्वर्ग में बगीचे होंगे जिनके नीचे नहरें बहेंगी। जब भी उन्हें उसमें से फल की व्यवस्था की जाएगी, तो वे कहेंगे, “यही वह चीज़ है जो हमें पहले प्रदान की गई थी।” और यह उन्हें समानता में दिया गया है. और वहाँ उनके जोड़े पवित्र किये जायेंगे, और वे उसमें सदैव रहेंगे।

Verse 151 (English):
And give good news to those who believe and do good deeds that they will have gardens in Paradise with rivers flowing beneath them. Whenever they are provided with fruit therefrom, they will say, “This is what we were provided with before.” And it is given to them in equality. And their spouses will be purified therein, and they will abide therein forever.

Verse 152 (Arabic):
إِنَّ اللَّهَ لَا يَسْتَحْيِي أَن يَضْرِبَ مَثَلًا مَّا بَعُوضَةً فَمَا فَوْقَهَا ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا فَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۖ وَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا فَيَقُولُونَ مَاذَا أَرَادَ اللَّهُ بِهَٰذَا مَثَلًا ۘ يُضِلُّ بِهِ كَثِيرًا وَيَهْدِي بِهِ كَثِيرًا ۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِ إِلَّا الْفَاسِقِينَ

Verse 152 iin hindi (Transliteration):
अल्लाह कोई उदाहरण पेश करने में डरपोक नहीं है – मच्छर का या उससे भी छोटे का। और जो लोग ईमान लाये वे जानते हैं कि यह उनके रब की ओर से सत्य है। परन्तु जो लोग इनकार करते हैं, वे कहते हैं, “इस उदाहरण से अल्लाह ने क्या इरादा किया?” वह इस प्रकार बहुतों को गुमराह करता है और बहुतों को मार्ग दिखाता है। और वह अवज्ञाकारियों के सिवा किसी को गुमराह नहीं करता।

Verse 152 (English):
Allah is not timid to present an example – that of a mosquito or what is smaller than it. And those who have believed know that it is the truth from their Lord. But as for those who disbelieve, they say, “What did Allah intend by this as an example?” He misleads many thereby and guides many thereby. And He misleads not except the defiantly disobedient.

Verse 153 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ

Verse 153 in hindi (Transliteration):
हे तुम जो विश्वास करते हो, धैर्य और प्रार्थना के माध्यम से सहायता मांगो। सचमुच अल्लाह धीरज वालों के साथ हैं।

Verse 153 (English):
O you who have believed, seek help through patience and prayer. Indeed, Allah is with the patient.

Verse 154 (Arabic):
وَلَا تَقُولُوا لِمَن يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ

Verse 154in hindi (Transliteration):
और जो लोग अल्लाह की राह में मारे गये उनके विषय में यह न कहो कि वे तो मर गये। बल्कि, वे जीवित हैं, परन्तु तुम्हें इसका आभास नहीं होता।

Verse 154 (English):
And do not say about those who were killed in the way of Allah that they are dead. Rather, they are alive, but you are not aware of it.

Verse 155 (Arabic):
وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ ۗ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ

Verse 155in hindi (Transliteration):
और हम तुम्हें डर और भूख और माल, जान और फलों के नुकसान से ज़रूर आज़माएँगे, लेकिन सब्र करने वालों को अच्छी ख़बर दे दो,

Verse 155 (English):
And We will surely test you with something of fear and hunger and a loss of wealth and lives and fruits, but give good tidings to the patient,

Verse 156 (Arabic):
الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ

Verse 156 in hindi(Transliteration):
जो जब उन पर विपत्ति आ पड़े तो कहते हैं, “हम तो अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटेंगे।”

Verse 156 (English):
Who, when disaster strikes them, say, “Indeed we belong to Allah, and indeed to Him we will return.”

Verse 157 (Arabic):
أُولَٰئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُهْتَدُونَ

Verse 157 (Transliteration):
वे अपने रब की ओर से (सही) मार्गदर्शन पर हैं, और वही लोग सफल हैं।

Verse 157 (English):
Those are upon [right] guidance from their Lord, and it is those who are the successful.

Verse 158 (Arabic):
إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَائِرِ اللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ اللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ

Verse 158 (Transliteration):
वास्तव में, अस-सफा और अल-मारवाह अल्लाह के प्रतीकों में से हैं। अतः जो व्यक्ति घर का हज करे या उमरा करे, उस पर उनके बीच में चलने में कोई दोष नहीं है। और जो कोई भलाई करे, तो निश्चय ही अल्लाह कृतज्ञ और जाननेवाला है।

Verse 158 (English):
Indeed, as-Safa and al-Marwah are among the symbols of Allah. So whoever makes Hajj to the House or performs ‘umrah – there is no blame upon him for walking between them. And whoever volunteers good – then indeed, Allah is appreciative and Knowing.

Verse 159 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالْهُدَىٰ مِن بَعْدِ مَا بَيَّنَّاهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتَابِ ۙ أُولَٰئِكَ يَلْعَنُهُمُ اللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللَّاعِنُونَ

Verse 159 (Transliteration):
Inna allatheena yaktumoona ma anzalna mina albayyinati waalhuda min baAAdi ma bayyanna hu lilnnasi fee alkitabi ola-ika yalAAanuhumu Allahu wayalAAanuhumu allainoon.

Verse 159 (English):
वास्तव में, जो लोग हमने जो कुछ स्पष्ट प्रमाण और मार्गदर्शन के रूप में उतारे हैं, उसे छिपाते हैं, इसके बाद कि हमने उसे लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर दिया है, वे लोग अल्लाह द्वारा शापित हैं और शाप देने वालों द्वारा शापित हैं।

Verse 160 (Arabic):
إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَبَيَّنُوا فَأُولَٰئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنَا التَّوَّابُ الرَّحِيمُ

Verse 160 (Transliteration):
सिवाय उन लोगों के जो पश्चाताप करते हैं और अपने आप को सुधारते हैं और स्पष्ट करते हैं [उन्होंने क्या छिपाया]। वे – मैं उनकी तौबा क़ुबूल करूँगा और मैं तौबा क़ुबूल करने वाला, दयालु हूँ।

Verse 160 (English):
Except for those who repent and correct themselves and make evident [what they concealed]. Those – I will accept their repentance, and I am the Accepting of repentance, the Merciful.

Verse 161 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَمَاتُوا وَهُمْ كُفَّارٌ أُولَٰئِكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ

Verse 161 (Transliteration):
निस्संदेह, जो लोग काफ़िर हुए और काफ़िर ही रहते हुए मर गए, उन पर अल्लाह और फ़रिश्तों और लोगों की लानत होगी,

Verse 161 (English):
Indeed, those who disbelieve and die while they are disbelievers – upon them will be the curse of Allah and of the angels and the people, all together,

Verse 162 (Arabic):
خَالِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ

Verse 162 (Transliteration):
उसमें सदैव निवास करना। उनके लिए सज़ा कम नहीं की जाएगी, न ही उन्हें राहत मिलेगी।

Verse 162 (English):
Abiding eternally therein. The punishment will not be lightened for them, nor will they be reprieved.

Verse 163 (Arabic):
وَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الرَّحْمَٰنُ الرَّحِيمُ

Verse 163 (Transliteration):
और तुम्हारा ईश्वर एक ईश्वर है। उसके सिवा कोई देवता [पूजा के योग्य] नहीं है, वह पूर्ण दयालु, विशेष दयालु है।

Verse 163 (English):
And your god is one God. There is no deity [worthy of worship] except Him, the Entirely Merciful, the Especially Merciful.

Verse 164 (Arabic):
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَالْفُلْكِ الَّتِي تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِمَا يَنفَعُ النَّاسَ وَمَا أَنزَلَ اللَّهُ مِنَ السَّمَاءِ مِن مَّاءٍ فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَابَّةٍ وَتَصْرِيفِ الرِّيَاحِ وَالسَّحَابِ الْمُسَخَّرِ بَيْنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ

Verse 164 (Transliteration):
वास्तव में, आकाशों और धरती की रचना में, और रात और दिन की अदला-बदली में, और (बड़े) जहाज़ जो समुद्र में उस चीज़ के साथ चलते हैं जिससे लोगों को लाभ होता है, और जो कुछ अल्लाह ने आकाश से वर्षा के रूप में उतारा है , इसके द्वारा पृथ्वी को उसके निर्जीव होने के बाद जीवन देना और उसमें हर प्रकार के गतिशील प्राणी को फैलाना, और (उसका) आकाश और पृथ्वी के बीच नियंत्रित हवाओं और बादलों का निर्देशन उन लोगों के लिए संकेत हैं जो तर्क का उपयोग करते हैं।

Verse 164 (English):
Indeed, in the creation of the heavens and the earth, and the alternation of the night and the day, and the [great] ships which sail through the sea with that which benefits people, and what Allah has sent down from the heavens of rain, giving life thereby to the earth after its lifelessness and dispersing therein every [kind of] moving creature, and [His] directing of the winds and the clouds controlled between the heaven and the earth are signs for a people who use reason.

Verse 165 (Arabic):
وَمِنَ النَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ اللَّهِ أَندَادًا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ اللَّهِ ۖ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِّلَّهِ ۗ وَلَوْ يَرَى الَّذِينَ ظَلَمُوا إِذْ يَرَوْنَ الْعَذَابَ أَنَّ الْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا وَأَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعَذَابِ

Verse 165 (Transliteration):
परन्तु लोगों में ऐसे भी लोग हैं जो अल्लाह के सिवा दूसरे को अपने बराबर समझते हैं। वे उनसे वैसे ही प्रेम करते हैं जैसे उन्हें अल्लाह से प्रेम करना चाहिए। परन्तु जो लोग ईमान लाए, वे अल्लाह के प्रति प्रेम में अधिक मजबूत हैं। और यदि वे लोग जिन्होंने अत्याचार किया है, जब वे यातना देखेंगे, तो उस पर विचार करेंगे, (उन्हें यकीन हो जाएगा) कि सारी शक्ति अल्लाह की है और अल्लाह कठोर दंड देने वाला है।

Verse 165 (English):
But among the people are those who take other than Allah as equals [to Him]. They love them as they [should] love Allah. But those who believe are stronger in love for Allah. And if only they who have wronged would consider [that] when they see the punishment, [they will be certain] that all power belongs to Allah and that Allah is severe in punishment.

Verse 166 (Arabic):
إِذْ تَبَرَّأَ الَّذِينَ اتُّبِعُوا مِنَ الَّذِينَ اتَّبَعُوا وَرَأَوُا الْعَذَابَ وَتَقَطَّعَتْ بِهِمُ الْأَسْبَابُ

Verse 166 (Transliteration):
[और उन्हें इस पर विचार करना चाहिए] जब जिन लोगों का अनुसरण किया गया है वे अपने आप को उन लोगों से अलग कर लेते हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, और वे [सभी] दंड देखते हैं, और उनसे संबंध तोड़ दिए जाते हैं,

Verse 166 (English):
[And they should consider that] when those who have been followed disassociate themselves from those who followed [them], and they [all] see the punishment, and cut off from them are the ties [of relationship],

Verse 167 (Arabic):
وَالَّذِينَ اتَّبَعُوا الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْأُمِّيَّ الَّذِي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِندَهُمْ فِي التَّوْرَاةِ وَالْإِنجِيلِ يَأْمُرُهُم بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَاهُمْ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ الطَّيِّبَاتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ الْخَبَائِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ إِصْرَهُمْ وَالْأَغْلَالَ الَّتِي كَانَتْ عَلَيْهِمْ ۚ فَالَّذِينَ آمَنُوا بِهِ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذِي أُنزِلَ مَعَهُ ۙ أُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ

Verse 167 (Transliteration):
और जो लोग उस रसूल के अनुयायी हुए, जो अनपढ़ नबी था, जिसे उन्होंने तौरात और इंजील में लिखा हुआ पाया, जो उन्हें सही का आदेश देता था और उन्हें गलत से रोकता था और उनके लिए अच्छी चीजों को वैध बनाता था और उनके लिए मना करता था। उन्हें बुराई से मुक्त करता है और उन्हें उनके बोझ और उन पर लगे बंधनों से छुटकारा दिलाता है। अतः जो लोग उस पर ईमान लाए, उसका सम्मान किया, उसका समर्थन किया और उस प्रकाश का अनुसरण किया जो उसके साथ भेजा गया था – यही लोग सफल होंगे।

Verse 167 (English):
And those who followed the Messenger, the unlettered prophet, whom they find written in what they have of the Torah and the Gospel, who enjoins upon them what is right and forbids them what is wrong and makes lawful for them the good things and prohibits for them the evil and relieves them of their burden and the shackles which were upon them. So they who have believed in him, honored him, supported him and followed the light which was sent down with him – it is those who will be the successful.

Verse 168 (Arabic):
يَا أَيُّهَا النَّاسُ قُولُوا مِنْ كَانَ فِيهِ شَكٌّ مِّن دِينِهِ فَلَا يَذْرُكُمْ فِي اللَّيْلِ وَلَا فِي النَّهَارِ ۚ وَاتَّبِعُوا مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكُمْ شَيْئًا ۚ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ

Verse 168 (Transliteration):
हे मानव जाति, पृथ्वी पर जो कुछ भी वैध और अच्छा है, उसमें से खाओ और शैतान के नक्शेकदम पर मत चलो। सचमुच, वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है।

Verse 168 (English):
O mankind, eat from whatever is on earth [that is] lawful and good and do not follow the footsteps of Satan. Indeed, he is to you a clear enemy.

Verse 169 (Arabic):
إِنَّمَا يَأْمُرُكُم بِالسُّوءِ وَالْفَحْشَاءِ وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ

Verse 169 (hindi):
वह तुम्हें केवल बुराई और अनैतिकता का आदेश देता है और अल्लाह के बारे में वह बातें कहने का आदेश देता है जो तुम नहीं जानते।

Verse 169 (English):
He only orders you to evil and immorality and to say about Allah what you do not know.

Verse 170 (Arabic):
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا ۚ أَوَلَوْ كَانَ الشَّيْطَانُ يَدْعُوهُمْ إِلَىٰ عَذَابِ السَّعِيرِ

Verse 170 (hindi):
और जब उनसे कहा जाता है, “अल्लाह ने जो उतारा है उसका अनुसरण करो,” तो वे कहते हैं, “बल्कि हम तो उसका अनुसरण करेंगे जो हमने अपने बाप-दादाओं को करते हुए पाया।” यद्यपि उनके बाप-दादे कुछ न समझते थे, और न उनको मार्ग दिखाया गया?

Verse 170 (English):
And when it is said to them, “Follow what Allah has revealed,” they say, “Rather, we will follow that which we found our fathers doing.” Even though their fathers understood nothing, nor were they guided?

Verse 171 (Arabic):
وَمَثَلُ الَّذِينَ كَفَرُوا كَمَثَلِ الَّذِي يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَاءً وَنِدَاءً ۚ صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ

Verse 171 (Transliteration):
काफ़िरों का उदाहरण उस व्यक्ति के समान है जो किसी ऐसी चीज़ पर चिल्लाता है जो सुनता नहीं है, लेकिन मवेशियों या भेड़ों को बुलाता है – बहरा, गूंगा और अंधा, इसलिए वे नहीं समझते।

Verse 171 (English):
The example of those who disbelieve is like that of one who shouts at what hears nothing but calls and cries cattle or sheep – deaf, dumb and blind, so they do not understand.

Verse 172 (Arabic):
يَا أَيُّهَا النَّاسُ كُلُوا مِمَّا فِي الْأَرْضِ حَلَالًا طَيِّبًا وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ ۚ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ

Verse 172 (Transliteration):
हे मानव जाति, पृथ्वी पर जो कुछ भी वैध और अच्छा है, उसमें से खाओ और शैतान के नक्शेकदम पर मत चलो। सचमुच, वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है।

Verse 172 (English):
O mankind, eat from whatever is on earth [that is] lawful and good and do not follow the footsteps of Satan. Indeed, he is to you a clear enemy.

Verse 173 (Arabic):
إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنزِيرِ وَمَا أُهِلَّ بِهِ لِغَيْرِ اللَّهِ ۖ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

Verse 173 (Transliteration):
उसने तुम्हारे लिए केवल मरे हुए जानवर, ख़ून, सूअर का मांस और वह सब कुछ हराम किया है जो अल्लाह के अलावा किसी और को समर्पित किया गया हो। परन्तु जो कोई [आवश्यकता से] विवश हो जाए, तो न तो [उसकी] इच्छा करे और न [उसकी सीमा] का उल्लंघन करे, उस पर कोई पाप नहीं। निस्संदेह, अल्लाह क्षमा करने वाला और दयालु है।

Verse 173 (English):
He has only forbidden to you dead animals, blood, the flesh of swine, and that which has been dedicated to other than Allah. But whoever is forced [by necessity], neither desiring [it] nor transgressing [its limit], there is no sin upon him. Indeed, Allah is Forgiving and Merciful.

Verse 174 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ مِنَ الْكِتَابِ وَيَشْتَرُونَ بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَٰئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ إِلَّا النَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ

Verse 174 (Transliteration):
निस्संदेह, जो लोग अल्लाह ने किताब में से जो कुछ उतारा है, उसे छिपाते हैं और उसके बदले में थोड़ी कीमत लेते हैं, वे आग के अलावा अपने पेट में कुछ नहीं भरते। और क़यामत के दिन अल्लाह उनसे बात नहीं करेगा और न उन्हें पवित्र करेगा। और उन्हें दुखद यातना मिलेगी।

Verse 174 (English):
Indeed, those who conceal what Allah has sent down of the Book and exchange it for a small price – they consume not into their bellies except the Fire. And Allah will not speak to them on the Day of Resurrection, nor will He purify them. And they will have a painful punishment.

Verse 175 (Arabic):
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَىٰ وَالْعَذَابَ بِالْمَغْفِرَةِ ۚ فَمَا أَصْبَرَهُمْ عَلَى النَّارِ

Verse 175 (Transliteration):
वही लोग हैं जिन्होंने ग़लती के बदले मार्गदर्शन और सज़ा के बदले माफ़ी का आदान-प्रदान किया है। तो आग की खोज में वे कितने धैर्यवान हैं!

Verse 175 (English):
Those are the ones who have exchanged guidance for error and forgiveness for punishment. So how patient are they in pursuit of the Fire!

Verse 176 (Arabic):
ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ نَزَّلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ ۗ وَإِنَّ الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِي الْكِتَابِ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ

Verse 176 (Transliteration):
ऐसा इसलिए है क्योंकि अल्लाह ने किताब को सच्चाई के साथ उतारा है। और वास्तव में, जो लोग किताब पर मतभेद रखते हैं वे अत्यधिक मतभेद में हैं।

Verse 176 (English):
That is because Allah has sent down the Book in truth. And indeed, those who differ over the Book are in extreme dissension.

Verse 177 (Arabic):
لَيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا ۖ وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ

Verse 177 (hindi):
नेकी यह नहीं है कि तुम अपना मुँह पूर्व या पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि (सच्ची) नेकी वह है जो अल्लाह, आख़िरत के दिन, फ़रिश्तों, किताब और पैगम्बरों पर ईमान लाए और इसके बावजूद भी धन दे। उसके प्रति प्रेम, सम्बन्धियों, अनाथों, दरिद्रों, मुसाफिरों, माँगनेवालों और दासों को छुड़ाने के प्रति प्रेम रखो; [और जो] नमाज़ स्थापित करता है और ज़कात देता है; [वे जो] वादा करके अपना वादा पूरा करते हैं; और [वे जो] गरीबी और कठिनाई में और युद्ध के दौरान धैर्यवान हैं। वही लोग सच्चे हैं, और वही लोग सच्चे हैं।

Verse 177 (English):
Righteousness is not that you turn your faces toward the east or the west, but [true] righteousness is [in] one who believes in Allah, the Last Day, the angels, the Book, and the prophets and gives wealth, in spite of love for it, to relatives, orphans, the needy, the traveler, those who ask [for help], and for freeing slaves; [and who] establishes prayer and gives zakah; [those who] fulfill their promise when they promise; and [those who] are patient in poverty and hardship and during battle. Those are the ones who have been true, and it is those who are the righteous.

Verse 178 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى ۖ الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنثَىٰ بِالْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ ۗ فَمَنِ اعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ

Verse 178 (Transliteration):
हे तुम जो विश्वास करते हो, तुम्हारे लिए हत्या किए गए लोगों के लिए कानूनी प्रतिशोध निर्धारित किया गया है – स्वतंत्र के लिए स्वतंत्र, दास के लिए दास, और महिला के लिए महिला। परन्तु जो कोई अपने भाई से कुछ भूल करे, तो उस से उचित रीति से बदला लिया जाए, और अच्छे चालचलन के साथ बदला दिया जाए। यह तुम्हारे रब की ओर से राहत और रहमत है। परन्तु जो कोई उसके बाद अपराध करेगा उसे दुखद यातना मिलेगी।

Verse 178 (English):
O you who have believed, prescribed for you is legal retribution for those murdered – the free for the free, the slave for the slave, and the female for the female. But whoever overlooks from his brother anything, then there should be a suitable follow-up and payment to him with good conduct. This is an alleviation from your Lord and a mercy. But whoever transgresses after that will have a painful punishment.

Verse 179 (Arabic):
وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ

Verse 179 (Transliteration):
और हे समझवालों, तुम्हारे लिये प्राण की रक्षा का कानूनी बदला है, कि तुम धर्मी बनो।

Verse 179 (English):
And there is for you in legal retribution [saving of] life, O you [people] of understanding, that you may become righteous.

Verse 180 (Arabic):
كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ

Verse 180 (Transliteration):
जब तुम में से किसी की मृत्यु निकट आ जाए तो तुम्हारे लिए यह नियम निर्धारित किया गया है कि यदि वह धन छोड़ जाए तो उसे अपने माता-पिता और करीबी रिश्तेदारों के लिए स्वीकार्य के अनुसार वसीयत करनी चाहिए – यह धर्मी लोगों पर एक कर्तव्य है।

Verse 180 (English):
Prescribed for you when death approaches [any] one of you if he leaves wealth [is that he should make] a bequest for the parents and near relatives according to what is acceptable – a duty upon the righteous.

Verse 181 (Arabic):
وَفَضْلٌ مِّنَ اللَّهِ وَنِعْمَةٌ ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ

Verse 181 (Transliteration):
और [याद करो] जब अल्लाह ने नबियों की वाचा ली, [कहा], “जो कुछ मैं तुम्हें शास्त्र और ज्ञान देता हूं और फिर जो कुछ तुम्हारे पास है उसकी पुष्टि करने वाला एक दूत तुम्हारे पास आता है, तुम्हें उस पर विश्वास करना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए उसे।” [अल्लाह] ने कहा, “क्या तुमने मेरी प्रतिबद्धता को स्वीकार किया है और उस पर अमल किया है?” उन्होंने कहा, ”हमने इसे स्वीकार कर लिया है.” उसने कहा, “फिर गवाही दो, और मैं गवाहों में तुम्हारे साथ हूं।”

Verse 181 (English):
And [remember] when Allah took the covenant of the prophets, [saying], “Whatever I give you of the Scripture and wisdom and then there comes to you a messenger confirming what is with you, you [must] believe in him and support him.” [Allah] said, “Have you acknowledged and taken upon that My commitment?” They said, “We have acknowledged it.” He said, “Then bear witness, and I am with you among the witnesses.”

Verse 182 (Arabic):
فَمَن تَوَلَّىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ

Verse 182 (Transliteration):
फिर जो कोई उसके बाद मुँह फेर ले, वही अवज्ञाकारी हैं।

Verse 182 (English):
Then whoever turns away after that – they are the defiantly disobedient.

Verse 183 (Arabic):
أَفَغَيْرَ دِينِ اللَّهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ

Verse 183 (Transliteration):
तो क्या यह अल्लाह के दीन से अलग है जिसे वे चाहते हैं, जबकि आकाशों और धरती के भीतर के लोगों ने स्वेच्छा से या मजबूरी से उसके अधीन कर दिया है, और वे उसी की ओर लौटा दिए जाएंगे?

Verse 183 (English):
Then is it other than the religion of Allah they desire, while to Him have submitted [all] those within the heavens and earth, willingly or by compulsion, and to Him they will be returned?

Verse 184 (Arabic):
قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ عَلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَا أُوتِيَ النَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ

Verse 184 (Transliteration):
कहो, [हे मुहम्मद], “हम अल्लाह पर ईमान लाए हैं और जो कुछ हम पर उतारा गया और जो कुछ इब्राहीम, इश्माएल, इसहाक, याकूब और वंशजों पर उतारा गया, और जो कुछ मूसा और ईसा और पैगम्बरों को दिया गया, उस पर हम ईमान लाए।” उनके भगवान से। हम उनमें से किसी के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं, और हम मुसलमान हैं [उसके प्रति समर्पित]।”u lahu muslimoon.

Verse 184 (English):
Say, [O Muhammad], “We have believed in Allah and in what was revealed to us and what was revealed to Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob, and the Descendants, and in what was given to Moses and Jesus and to the prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and we are Muslims [submitting] to Him.”

Verse 185 (Arabic):
وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ

Verse 185 (Transliteration):
और जो कोई इस्लाम के अलावा किसी और धर्म की इच्छा करेगा, उससे वह कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटे में रहेगा।

Verse 185 (English):
And whoever desires other than Islam as religion – never will it be accepted from him, and he, in the Hereafter, will be among the losers.

Verse 186 (Arabic):
كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَشَهِدُوا أَنَّ الرَّسُولَ حَقٌّ وَجَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ

Verse 186 (Transliteration):
अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखा सकता है जिन्होंने अपने ईमान के बाद इनकार कर दिया और गवाही दे दी कि रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी हैं? और अल्लाह ज़ालिम लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।

Verse 186 (English):
How can Allah guide a people who disbelieved after their belief and had witnessed that the Messenger is true and clear signs had come to them? And Allah does not guide the wrongdoing people.

Verse 192 (Arabic):
رَبَّنَا إِنَّكَ مَن تُدْخِلِ النَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُ ۖ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ

Verse 192 (Transliteration):
हमारे पालनहार, वास्तव में जिसे तुमने आग में प्रवेश कराया, तुमने उसे अपमानित किया है और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं है।

Verse 192 (English):
Our Lord, indeed whoever You admit to the Fire – You have disgraced him, and for the wrongdoers there are no helpers.

Verse 193 (Arabic):
رَّبَّنَا إِنَّنَا سَمِعْنَا مُنَادِيًا يُنَادِي لِلْإِيمَانِ أَنْ آمِنُوا بِرَبِّكُمْ فَآمَنَّا ۚ رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الْأَبْرَارِ

Verse 193 (Transliteration):
हमारे रब, हमने एक पुकारने वाले को ईमान की दुहाई देते हुए सुना है, ‘अपने रब पर विश्वास करो’ और हम ईमान ले आये। ऐ हमारे रब, तू हमारे गुनाहों को माफ कर दे और हमारे गुनाहों को हमसे दूर कर दे और हमें नेक लोगों के साथ मौत दे।

Verse 193 (English):
Our Lord, indeed we have heard a caller calling to faith, [saying], ‘Believe in your Lord,’ and we have believed. Our Lord, so forgive us our sins and remove from us our misdeeds and cause us to die with the righteous.

Verse 194 (Arabic):
رَّبَّنَا وَآتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ

Verse 194 (Transliteration):
हमारे भगवान, और हमें वह प्रदान करें जो आपने अपने दूतों के माध्यम से हमसे वादा किया था और पुनरुत्थान के दिन हमें अपमानित न करें। सचमुच, तू [अपने] वादे से चूकता नहीं।”

Verse 194 (English):
Our Lord, and grant us what You promised us through Your messengers and do not disgrace us on the Day of Resurrection. Indeed, You do not fail in [Your] promise.”

Verse 195 (Arabic):
فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ أَنِّي لَا أُضِيعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ ۖ بَعْضُكُم مِّن بَعْضٍ ۖ فَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَأُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأُوذُوا فِي سَبِيلِي وَقَاتَلُوا وَقُتِلُوا لَأُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأُدْخِلَنَّهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ثَوَابًا مِّنْ عِندِ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عِندَهُ حُسْنُ الثَّوَابِ

Verse 195 (Transliteration):
तो उनके रब ने उन्हें जवाब दिया, “मैं तुममें से किसी भी मजदूर का काम कभी बर्बाद नहीं होने दूंगा, चाहे वह पुरुष हो या महिला; तुम एक दूसरे के हो। इसलिए जो लोग पलायन कर गए या अपने घरों से निकाल दिए गए या नुकसान उठाया गया या मेरे कारण लड़े या मारे गए – मैं निश्चित रूप से उनसे उनके कुकर्मों को दूर कर दूंगा, और निश्चित रूप से उन्हें उन बागों में प्रवेश कराऊंगा जिनके नीचे अल्लाह की ओर से इनाम के रूप में नहरें बह रही होंगी, और अल्लाह के पास सबसे अच्छा इनाम है।”

Verse 195 (English):
So their Lord responded to them, “Never will I allow to be lost the work of [any] worker among you, whether male or female; you are of one another. So those who emigrated or were evicted from their homes or were harmed in My cause or fought or were killed – I will surely remove from them their misdeeds, and I will surely admit them to gardens beneath which rivers flow as reward from Allah, and Allah has with Him the best reward.”

Verse 196 (Arabic):
لَا يَغُرَّنَّكَ تَقَلُّبُ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي الْبِلَادِ

Verse 196 (Transliteration):
धरती भर में काफ़िरों की चाल तुम्हें धोखा न दे।

Verse 196 (English):
Let not the movement of those who disbelieve throughout the land deceive you.

Verse 197 (Arabic):
الْحَجُّ أَشْهُرٌ مَّعْلُومَاتٌ ۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ الْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِي الْحَجِّ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَتَزَوَّدُوا فَإِنَّ خَيْرَ الزَّادِ التَّقْوَىٰ ۚ وَاتَّقُونِ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ

Verse 197 (Transliteration):
हज [के दौरान] प्रसिद्ध महीनों में होता है, इसलिए जिसने भी उसमें [एहराम की स्थिति में प्रवेश करके] हज को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है, उसके लिए हज के दौरान कोई यौन संबंध नहीं है, कोई अवज्ञा नहीं है और कोई विवाद नहीं है। और जो कुछ तुम अच्छा करो, अल्लाह उसे जानता है। और सामान ले लो, लेकिन सबसे अच्छा सामान अल्लाह का डर है। और हे समझ वालों, मुझ से डरो।

Verse 197 (English):
The Hajj is [during] well-known months, so whoever has made Hajj obligatory upon himself therein [by entering the state of ihram], there is [to be for him] no sexual relations and no disobedience and no disputing during Hajj. And whatever good you do – Allah knows it. And take provisions, but indeed, the best provision is fear of Allah. And fear Me, O you of understanding.

Verse 198 (Arabic):
لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ ۚ فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ ۖ وَاذْكُرُوهُ كَمَا هَدَاكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِ لَمِنَ الضَّالِّينَ

Verse 198 (Transliteration):
(हज के दौरान) अपने रब से इनाम मांगने में आप पर कोई दोष नहीं है। लेकिन जब आप अराफ़ात से प्रस्थान करें, तो अल-मशर अल-हरम में अल्लाह को याद करें। और उसे याद करो, जैसे उसने तुम्हें मार्ग दिखाया, वास्तव में, तुम इससे पहले भी गुमराहों में से थे।

Verse 198 (English):
There is no blame upon you for seeking bounty from your Lord [during Hajj]. But when you depart from ‘Arafat, remember Allah at al-Mash’ar al-Haram. And remember Him, as He has guided you, for indeed, you were before that among those astray.

Verse 199 (Arabic):
ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

Verse 199 (Transliteration):
Thumma afeedoo min haythu afa
फिर उस स्थान से प्रस्थान करें जहां से [सभी] लोग प्रस्थान करते हैं और अल्लाह से क्षमा मांगते हैं। निस्संदेह, अल्लाह क्षमा करने वाला और दयालु है।

Verse 199 (English):
Then depart from the place from where [all] the people depart and ask forgiveness of Allah. Indeed, Allah is Forgiving and Merciful.

Verse 200 (Arabic):
فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَاسِكَكُمْ فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَذِكْرِكُمْ آبَاءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًا ۗ فَمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ

Verse 200 (Transliteration):
और जब तुम अपना संस्कार पूरा कर लो, तो अल्लाह को अपने पुरखाओं की तरह याद करो, या उससे भी अधिक याद के साथ। और लोगों में वह भी है जो कहता है, “हमारे रब, हमें संसार में दे दे,” और आख़िरत में उसका कोई हिस्सा न होगा।

Verse 200 (English):
And when you have completed your rites, remember Allah like your [previous] remembrance of your fathers or with [much] greater remembrance. And among the people is he who says, “Our Lord, give us in this world,” and he will have in the Hereafter no share.

Verse 201 (Arabic):
وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

Verse 201 (Transliteration):
और उनमें वे लोग भी हैं जो कहते हैं, “हमारे रब! हमें इस दुनिया में और आख़िरत में भी अच्छा दे और आग की यातना से हमारी रक्षा कर।”

Verse 201 (English):
And among them are those who say, “Our Lord, give us in this world [that which is] good and in the Hereafter [that which is] good and protect us from the punishment of the Fire.”

Verse 202 (Arabic):
أُولَٰئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّمَّا كَسَبُوا ۚ وَاللَّهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ

Verse 202 (Transliteration):
जो कुछ उन्होंने कमाया है उसमें से उनके लिए एक हिस्सा (इनाम) होगा और अल्लाह हिसाब लेने में तेज़ है।

Verse 202 (English):
For them there will be a share [of reward] from what they have earned, and Allah is swift in account.

Verse 203 (Arabic):
وَاذْكُرُوا اللَّهَ فِي أَيَّامٍ مَّعْدُودَاتٍ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ لِمَنِ اتَّقَىٰ ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ

Verse 203 (Transliteration):
और गिनती के दिनों में अल्लाह को याद करो। फिर जो कोई दो दिन में शीघ्रता करे, उस पर कोई पाप नहीं; और जो व्यक्ति (तीसरे तक) विलम्ब करेगा, उस पर कोई पाप नहीं, जो अल्लाह से डरेगा। और अल्लाह से डरो और जान लो कि तुम उसी की ओर इकट्ठे किए जाओगे.

Verse 203 (English):
And remember Allah during [specific] numbered days. Then whoever hastens [his departure] in two days – there is no sin upon him; and whoever delays [until the third] – there is no sin upon him – for him who fears Allah. And fear Allah and know that unto Him you will be gathered.

Verse 204 (Arabic):
وَمِنَ النَّاسِ مَن يُعْجِبُكَ قَوْلُهُ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَيُشْهِدُ اللَّهَ عَلَىٰ مَا فِي قَلْبِهِ وَهُوَ أَلَدُّ الْخِصَامِ

Verse 204 (Transliteration):
और लोगों में से वह है जिसकी वाणी तुम्हें सांसारिक जीवन में प्रसन्न करती है, और जो कुछ उसके दिल में है उस पर अल्लाह को गवाह बनाता है, फिर भी वह विरोधियों में सबसे उग्र है।isam.

Verse 204 (English):
And of the people is he whose speech pleases you in worldly life, and he calls Allah to witness as to what is in his heart, yet he is the fiercest of opponents.

Verse 205 (Arabic):
وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِي الْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ الْحَرْثَ وَالنَّسْلَ ۗ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الْفَسَادَ

Verse 205 (Transliteration):
और जब वह चला जाता है, तो सारे देश में उपद्रव मचाने और फसलों और पशुओं को नष्ट करने का यत्न करता है। और अल्लाह को भ्रष्टाचार पसंद नहीं है.

Verse 205 (English):
And when he goes away, he strives throughout the land to cause corruption therein and destroy crops and animals. And Allah does not like corruption.

Verse 206 (Arabic):
وَإِذَا قِيلَ لَهُ اتَّقِ اللَّهَ أَخَذَتْهُ الْعِزَّةُ بِالْإِثْمِ ۚ فَحَسْبُهُ جَهَنَّمُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمِهَادُ

Verse 206 (Transliteration):
और जब उससे कहा जाता है, “अल्लाह से डरो,” तो उसे पाप पर गर्व हो जाता है। उसके लिए नरक की आग ही काफ़ी है, और विश्राम का स्थान कितना बुरा है।

Verse 206 (English):
And when it is said to him, “Fear Allah,” pride in the sin takes hold of him. Sufficient for him is Hellfire, and how wretched is the resting place.

Verse 207 (Arabic):
وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ

Verse 207 (Transliteration):
और लोगों में से वह है जो अल्लाह की प्रसन्नता के लिए साधन ढूंढ़ते हुए अपने आप को बेच देता है। और अल्लाह अपने बन्दों पर मेहरबान है।

Verse 207 (English):
And of the people is he who sells himself, seeking means to the approval of Allah. And Allah is kind to [His] servants.

Verse 208 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ادْخُلُوا فِي السِّلْمِ كَافَّةً وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ ۚ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ

Verse 208 (Transliteration):
हे तुम जो विश्वास करते हो, पूरी तरह से इस्लाम में प्रवेश करो और शैतान के नक्शेकदम पर मत चलो। सचमुच, वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है।

Verse 208 (English):
O you who have believed, enter into Islam completely [and perfectly] and do not follow the footsteps of Satan. Indeed, he is to you a clear enemy.

Verse 209 (Arabic):
فَإِن زَلَلْتُم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْكُمُ الْبَيِّنَاتُ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ

Verse 209 (Transliteration):
Fain zallaltum min baAAdi ma jaat
परन्तु यदि तुम्हारे पास स्पष्ट प्रमाण आ जाने के बाद भी तुम विचलित हो जाओ, तो जान लो कि अल्लाह अत्यंत प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है।

Verse 209 (English):
But if you deviate after clear proofs have come to you, then know that Allah is Exalted in Might and Wise.

Verse 210 (Arabic):
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن يَأْتِيَهُمُ اللَّهُ فِي ظُلَلٍ مِّنَ الْغَمَامِ وَالْمَلَائِكَةُ وَقُضِيَ الْأَمْرُ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ

Verse 210 (Transliteration):
क्या वे इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि अल्लाह बादलों की आड़ में और फ़रिश्ते उनके पास आएँ और मामला तय हो जाए? और अल्लाह की ओर (सभी) मामले लौटाए जाते हैं।

Verse 210 (English):
Do they await but that Allah should come to them in covers of clouds and the angels [as well] and the matter is [then] decided? And to Allah [all] matters are returned.

Verse 211 (Arabic):
اسْتَفْتَحُوا فَتْحًا عَظِيمًا

Verse 211 (Transliteration):
इसराईल की सन्तान से पूछो कि हमने उन्हें कितनी निशानियाँ दी हैं। परन्तु जो कोई अल्लाह का अनुग्रह उसके पास आ जाने के बाद उसे बदल दे, तो निश्चय ही अल्लाह कठोर दण्ड देने वाला है।

Verse 211 (English):
Ask the Children of Israel how many signs of evidence We gave them. But whoever replaces Allah’s favor after it has come to him – then indeed, Allah is severe in penalty.

Verse 212 (Arabic):
وَزُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا ۘ وَالَّذِينَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ

Verse 212 (Transliteration):
जिन लोगों ने इनकार किया उनके लिए इस संसार का जीवन शोभायमान है, और जो लोग ईमान लाए, वे उनका उपहास करते हैं। परन्तु जो लोग अल्लाह से डरते हैं, वे क़ियामत के दिन उनसे ऊपर हैं। और अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब जीविका देता है।

Verse 212 (English):
Beautified for those who disbelieve is the life of this world, and they ridicule those who believe. But those who fear Allah are above them on the Day of Resurrection. And Allah gives provision to whom He wills without account.

Verse 213 (Arabic):
كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ ۗ وَاللَّهُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ

Verse 213 (Transliteration):
मानव जाति [अपने विचलन से पहले] एक ही धर्म की थी; फिर अल्लाह ने पैगम्बरों को शुभ सूचना देने वाले और सचेत करने वाले बनाकर भेजा और उनके साथ सत्य पुस्तक उतारी, ताकि लोगों के बीच उस बात का निर्णय कर सके जिसमें उन्होंने मतभेद किया था। और पवित्रशास्त्र पर किसी ने मतभेद नहीं किया सिवाय उन लोगों के जिन्हें यह दिया गया था – उनके पास स्पष्ट प्रमाण आने के बाद – आपस में ईर्ष्यालु शत्रुता के कारण। और अल्लाह ने उन लोगों को, जो ईमान लाये थे, अपनी अनुमति से उस चीज़ में सत्य की ओर मार्ग दिखाया, जिस पर उन्होंने मतभेद किया था। और अल्लाह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है।

Verse 213 (English):
Mankind was [of] one religion [before their deviation]; then Allah sent the prophets as bringers of good tidings and warners and sent down with them the Scripture in truth to judge between the people concerning that in which they differed. And none differed over the Scripture except those who were given it – after the clear proofs came to them – out of jealous animosity among themselves. And Allah guided those who believed to the truth concerning that over which they had differed, by His permission. And Allah guides whom He wills to a straight path.

Verse 214 (Arabic):
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ الْبَأْسَاءُ وَالضَّرَّاءُ وَزُلْزِلُوا حَتَّىٰ يَقُولَ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ مَتَىٰ نَصْرُ اللَّهِ ۗ أَلَا إِنَّ نَصْرَ اللَّهِ قَرِيبٌ

Verse 214 (Transliteration):
या क्या तुम्हें लगता है कि तुम जन्नत में दाखिल हो जाओगे, जबकि तुम्हारे पास अभी ऐसी परीक्षा नहीं आई है, जैसी तुम्हारे पहले आने वालों पर आई थी? वे गरीबी और कठिनाई से प्रभावित हुए और यहां तक कि उनके दूत और उनके साथ ईमान लाने वालों ने कहा, “अल्लाह की मदद कब है?” निःसंदेह अल्लाह की सहायता निकट है।

Verse 214 (English):
Or do you think that you will enter Paradise while such [trial] has not yet come to you as came to those who passed on before you? They were touched by poverty and hardship and were shaken until [even their] messenger and those who believed with him said,”When is the help of Allah?” Unquestionably, the help of Allah is near.

Verse 215 (Arabic):
يَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُل مَا أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍ فَلِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ

Verse 215 (Transliteration):
वे आपसे पूछते हैं, [हे मुहम्मद], उन्हें क्या खर्च करना चाहिए। कहो, “जो कुछ तुम भलाई में खर्च करोगे वह माता-पिता और रिश्तेदारों और यतीमों और जरूरतमंदों और मुसाफिरों के लिए है। और जो कुछ भी तुम भलाई करोगे, निस्संदेह अल्लाह उसे जानने वाला है।”

Verse 215 (English):
They ask you, [O Muhammad], what they should spend. Say, “Whatever you spend of good is [to be] for parents and relatives and orphans and the needy and the traveler. And whatever you do of good – indeed, Allah is Knowing of it.”

Verse 216 (Arabic):
كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ

Verse 216 (Transliteration):
तुम्हें युद्ध का आदेश दिया गया है, जबकि यह तुम्हारे लिए घृणास्पद है। परन्तु कदाचित् तुम्हें कोई चीज़ नफ़रत हो और वह तुम्हारे लिये अच्छी हो; और शायद आपको कोई चीज़ पसंद हो और वह आपके लिए बुरी हो। और अल्लाह जानता है, परन्तु तुम नहीं जानते।

Verse 216 (English):
Fighting has been enjoined upon you while it is hateful to you. But perhaps you hate a thing and it is good for you; and perhaps you love a thing and it is bad for you. And Allah Knows, while you know not.

Verse 217 (Arabic):
يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ كَبِيرٌ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ اللَّهِ وَكُفْرٌ بِهِ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ اللَّهِ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَاتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ اسْتَطَاعُوا ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَأُولَٰئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۖ وَأُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

Verse 217 (Transliteration):
वे तुमसे पवित्र महीने के बारे में – उसमें लड़ने के बारे में पूछते हैं। कहो, “उसमें लड़ना बड़ा पाप है, लेकिन लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकना और उस पर अविश्वास करना और अल-मस्जिद-अल-हरम तक पहुंच रोकना और वहां से उसके लोगों को निकालना उससे भी बड़ा पाप है।” अल्लाह की दृष्टि। और फ़ित्ना हत्या से भी बढ़कर है।” और वे तब तक तुमसे लड़ते रहेंगे जब तक कि वे तुम्हें तुम्हारे धर्म से वापस न लौटा दें, यदि उनका वश चले तो। और तुम में से जो कोई अपने दीन से फिरे और काफ़िर ही होकर मरे, तो उनके कर्म इस लोक और परलोक में व्यर्थ हो गए, और वही आग के साथी हैं; वे उसमें अनन्त काल तक निवास करेंगे।

Verse 217 (English):
They ask you about the sacred month – about fighting therein. Say, “Fighting therein is great [sin], but averting [people] from the way of Allah and disbelief in Him and [preventing access to] al-Masjid al-Haram and the expulsion of its people therefrom are greater [evil] in the sight of Allah. And fitnah is greater than killing.” And they will continue to fight you until they turn you back from your religion if they are able. And whoever of you reverts from his religion [to disbelief] and dies while he is a disbeliever – for those, their deeds have become worthless in this world and the Hereafter, and those are the companions of the Fire; they will abide therein eternally.

Verse 218 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ اللَّهِ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

Verse 218 (Transliteration):
निस्संदेह, जो लोग ईमान लाए और जो लोग हिजरत कर गए और अल्लाह की राह में युद्ध किया, वे अल्लाह की दया की आशा रखते हैं। और अल्लाह क्षमा करने वाला और दयालु है।

Verse 218 (English):
Indeed, those who have believed and those who have emigrated and fought in the cause of Allah – those expect the mercy of Allah. And Allah is Forgiving and Merciful.

Verse 219 (Arabic):
يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْبَرُ مِن نَّفْعِهِمَا ۗ وَيَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ قُلِ الْعَفْوَ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ

Verse 219 (Transliteration):
वे आपसे शराब और जुए के बारे में पूछते हैं। कहो, “उनमें बड़ा पाप है और (फिर भी, कुछ) लोगों के लिए लाभ है। लेकिन उनका पाप उनके लाभ से बड़ा है।” और वे आपसे पूछते हैं कि उन्हें क्या खर्च करना चाहिए। कहो, “अतिरिक्त [आवश्यकताओं से परे]।” इस प्रकार अल्लाह तुम्हें आयतें (रहस्योद्घाटन की) स्पष्ट कर देता है ताकि तुम विचार करो।

Verse 219 (English):
They ask you about wine and gambling. Say, “In them is great sin and [yet, some] benefit for people. But their sin is greater than their benefit.” And they ask you what they should spend. Say, “The excess [beyond needs].” Thus Allah makes clear to you the verses [of revelation] that you might give thought.

Verse 223 (Arabic):
نِّسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَّكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ ۖ وَقَدِّمُوا لِأَنفُسِكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُم مُّلَاقُوهُ ۗ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ

Verse 223 (Transliteration):
तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारे लिये बीज बोने का स्थान हैं, इसलिये तुम जो चाहो अपने खेती के स्थान में आओ और अपने लिये [धार्मिकता] उत्पन्न करो। और अल्लाह से डरो और जान लो कि तुम उससे मिलोगे। और ईमानवालों को शुभ सूचना दे दो।

Verse 223 (English):
Your wives are a place of sowing of seed for you, so come to your place of cultivation however you wish and put forth [righteousness] for yourselves. And fear Allah and know that you will meet Him. And give good tidings to the believers.

Verse 224 (Arabic):
وَلَا تَجْعَلُوا اللَّهَ عُرْضَةً لِّأَيْمَانِكُمْ أَن تَبَرُّوا وَتَتَّقُوا وَتُصْلِحُوا بَيْنَ النَّاسِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

Verse 224 (Transliteration):
और अल्लाह की शपथ को नेक होने, अल्लाह से डरने और लोगों के बीच शांति स्थापित करने के विरुद्ध बहाना न बनाओ। और अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

Verse 224 (English):
And do not make [your oath by] Allah an excuse against being righteous and fearing Allah and making peace among people. And Allah is Hearing and Knowing.

Verse 225 (Arabic):
لَّا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا عَقَّدتُّمُ الْأَيْمَانَ ۖ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ ۖ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ ۚ ذَٰلِكَ كَفَّارَةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ ۚ وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

Verse 225 (Transliteration):
अल्लाह तुम्हारी क़समों में जो कुछ व्यर्थ है उसके लिए तुम पर दोष नहीं लगाएगा, बल्कि जो शपथ तुमने खाई है उसके लिए वह तुम पर दोष लगाएगा। तो इसका प्रायश्चित यह है कि आप अपने परिवारों को जो खाना खिलाते हैं, उसके औसत से दस जरूरतमंदों को खाना खिलाएं या उन्हें कपड़े पहनाएं या एक गुलाम को आज़ाद करें। परन्तु जो कोई न पा सके [या खरीद न सके] – तो तीन दिन का उपवास [आवश्यक है]। जब तुम शपथ खा चुके हो तो यह शपथ का प्रायश्चित है। परन्तु अपनी शपथ की रक्षा करो। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें खोलता है ताकि तुम कृतज्ञ हो जाओ।

Verse 225 (English):
Allah will not impose blame upon you for what is meaningless in your oaths, but He will impose blame upon you for [breaking] what you intended of oaths. So its expiation is the feeding of ten needy people from the average of that which you feed your [own] families or clothing them or the freeing of a slave. But whoever cannot find [or afford it] – then a fast of three days [is required]. That is the expiation for oaths when you have sworn. But guard your oaths. Thus does Allah make clear to you His verses that you may be grateful.

Verse 226 (Arabic):
الَّذِينَ يُؤْلُونَ مِنكُم مِّنْ أَزْوَاجِهِمْ مَّا أُمَّهَاتُهُمْ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ

Verse 226 (Transliteration):
जो लोग तुम्हारे बीच अपनी पत्नियों से अलग होने के लिए तिहार का उच्चारण करते हैं, वे उनकी माता नहीं हैं। उनकी माताएं कोई और नहीं बल्कि वे ही हैं जिन्होंने उन्हें जन्म दिया। और वाकई ये आपत्तिजनक बयान और झूठ बोल रहे हैं. परन्तु वास्तव में, अल्लाह क्षमा करने वाला और क्षमा करने वाला है।

Verse 226 (English):
Those who pronounce thihar among you [to separate] from their wives – they are not [consequently] their mothers. Their mothers are none but those who gave birth to them. And indeed, they are saying an objectionable statement and a falsehood. But indeed, Allah is Pardoning and Forgiving.

Verse 227 (Arabic):
وَالَّذِينَ يُؤْلُونَ مِن نِّسَائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِّن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ

Verse 227 (Transliteration):
और जो लोग अपनी पत्नियों से तिहार कहते हैं और फिर जो कुछ उन्होंने कहा है उस पर फिर जाते हैं – तो इससे पहले कि वे एक-दूसरे को छूएं, एक दास की मुक्ति [होनी चाहिए]। इसी से तुम्हें चिताया जाता है; और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे परिचित है।

Verse 227 (English):
And those who pronounce thihar from their wives and then [wish to] go back on what they said – then [there must be] the freeing of a slave before they touch one another. That is what you are admonished thereby; and Allah is Acquainted with what you do.

Verse 228 (Arabic):
وَالْمُطَلَّقَاتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَاثَةَ قُرُوءٍ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ اللَّهُ فِي أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِي ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوا إِصْلَاحًا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ الَّذِي عَلَيْهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ

Verse 228 (Transliteration):
तलाकशुदा महिलाएं तीन अवधियों तक प्रतीक्षा में रहती हैं, और यदि वे अल्लाह और अंतिम दिन पर विश्वास करती हैं तो उनके लिए यह छिपाना वैध नहीं है कि अल्लाह ने उनके गर्भ में क्या बनाया है। और उनके पतियों को इस [अवधि] में उन्हें वापस लेने का अधिक अधिकार है यदि वे सुलह चाहते हैं। और पत्नियों का हक़ वैसा ही है जैसा कि उनसे अपेक्षा की जाती है, जो उचित है। लेकिन पुरुषों के पास [जिम्मेदारी और अधिकार में] एक डिग्री होती है। और अल्लाह प्रभुत्वशाली और बुद्धिमान है।

Verse 228 (English):
Divorced women remain in waiting for three periods, and it is not lawful for them to conceal what Allah has created in their wombs if they believe in Allah and the Last Day. And their husbands have more right to take them back in this [period] if they want reconciliation. And due to the wives is similar to what is expected of them, according to what is reasonable. But the men have a degree over them [in responsibility and authority]. And Allah is Exalted in Might and Wise.

Verse 229 (Arabic):
الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلَّا أَن يَخَافَا أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ

Verse 229 (Transliteration):
तलाक दो बार होता है. फिर, या तो [उसे] स्वीकार्य तरीके से रखें या अच्छे इलाज के साथ [उसे] छोड़ दें। और जो कुछ तुमने उन्हें दिया है उसमें से कुछ भी लेना तुम्हारे लिए उचित नहीं है, जब तक कि दोनों को यह डर न हो कि वे अल्लाह की सीमाओं के भीतर नहीं रह सकेंगे। परन्तु यदि तुम्हें डर है कि वे अल्लाह की सीमाओं के भीतर नहीं रहेंगे, तो उस चीज़ में जो वह अपने आप को छुड़ा ले, उनमें से किसी पर कोई दोष नहीं है। ये अल्लाह की सीमाएं हैं, अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करेगा, वही ज़ालिम हैं।

Verse 229 (English):
Divorce is twice. Then, either keep [her] in an acceptable manner or release [her] with good treatment. And it is not lawful for you to take anything of what you have given them unless both fear that they will not be able to keep [within] the limits of Allah. But if you fear that they will not keep [within] the limits of Allah, then there is no blame upon either of them concerning that by which she ransoms herself. These are the limits of Allah, so do not transgress them. And whoever transgresses the limits of Allah – it is those who are the wrongdoers.

Verse 230 (Arabic):
فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ

Verse 230 (Transliteration):
तो यदि वह उसे [तीसरी बार] तलाक दे दे, तो उसके बाद वह उसके लिए वैध नहीं होगी, जब तक कि वह उसके अलावा किसी अन्य पति से विवाह न कर ले। और यदि बाद वाला पति उसे तलाक दे दे [या मर जाए], तो महिला और उसके पूर्व पति पर एक-दूसरे के पास लौटने में कोई दोष नहीं है, यदि वे सोचते हैं कि वे अल्लाह की सीमाओं के भीतर रह सकते हैं। ये अल्लाह की सीमाएं हैं, जिन्हें वह जानने वाले लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है।

Verse 230 (English):
So if he divorces her [for the third time], then she is not lawful to him afterward until [after] she marries a husband other than him. And if the latter husband divorces her [or dies], there is no blame upon the woman and her former husband for returning to each other if they think that they can keep [within] the limits of Allah. These are the limits of Allah, which He makes clear to a people who know.

Verse 231 (Arabic):
وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ ۚ وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًا لِّتَعْتَدُوا ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُ ۚ وَلَا تَتَّخِذُوا آيَاتِ اللَّهِ هُزُوًا ۚ وَاذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمَا أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ الْكِتَابِ وَالْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

Verse 231 (Transliteration):
और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दो और वे अपनी अवधि पूरी कर चुकी हों, तो या तो उन्हें स्वीकार्य शर्तों के अनुसार रख लो या स्वीकार्य शर्तों के अनुसार उन्हें छोड़ दो, और उन्हें नुकसान पहुँचाने या उनके विरुद्ध अत्याचार करने के इरादे से मत रखो। और जिसने ऐसा किया उसने निश्चय ही अपने ऊपर अन्याय किया है। और अल्लाह की आयतों को मज़ाक में न लो। और अपने ऊपर अल्लाह के उपकार को याद करो और जो किताब और हिकमत तुम्हारी ओर उतारी गई है, जिससे वह तुम्हें शिक्षा देता है। और अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है।

Verse 231 (English):
And when you divorce women and they have [nearly] fulfilled their term, either retain them according to acceptable terms or release them according to acceptable terms, and do not keep them, intending harm, to transgress [against them]. And whoever does that has certainly wronged himself. And do not take the verses of Allah in jest. And remember the favor of Allah upon you and what has been revealed to you of the Book and wisdom by which He instructs you. And fear Allah and know that Allah is Knowing of all things.

Verse 232 (Arabic):
وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ إِذَا تَرَاضَوْا بَيْنَهُم بِالْمَعْرُوفِ ۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِ مَن كَانَ مِنكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۗ ذَٰلِكُمْ أَزْكَىٰ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ

Verse 232 (Transliteration):
और जब तुम स्त्रियों को तलाक दो और वे अपनी अवधि पूरी कर लें, तो उन्हें अपने (पूर्व) पतियों से दोबारा विवाह करने से न रोको, यदि वे स्वीकार्य आधार पर आपस में सहमत हों। तुममें से जो कोई अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लाए, उसे यही हिदायत दी गई है। वह तुम्हारे लिए बेहतर और पवित्र है और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।

Verse 232 (English):
And when you divorce women and they have fulfilled their term, do not prevent them from remarrying their [former] husbands if they agree among themselves on an acceptable basis. That is instructed to whoever of you believes in Allah and the Last Day. That is better for you and purer, and Allah knows and you know not.

Verse 233 (Arabic):
الْوَالِدَاتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَادَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ ۖ لِمَنْ أَرَادَ أَن يُتِمَّ الرَّضَاعَةَ ۚ وَعَلَى الْمَوْلُودِ لَهُ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۚ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَا تُضَارَّ وَالِدَةٌ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌ لَّهُ بِوَلَدِهِ ۚ وَعَلَى الْوَارِثِ مِثْلُ ذَٰلِكَ ۗ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٍ مِّنْهُمَا وَتَشَاوُرٍ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا ۗ وَإِنْ أَرَدتُّمْ أَن تَسْتَرْضِعُوا أَوْلَادَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُم مَّا آتَيْتُم بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ

Verse 233 (Transliteration):
Alw a lid a tu yur d iAAna awl a dahunna h awlayni k a milayni liman ar a da an yutimmara d aAAata waAAal a almawloodi lahu rizquhunna wakiswatuhunna bialmaAAroofi l a tukallafu nafsun ill a wusAAah a l a tu d arra wa a lidatun biwaladih a wal a mawloodun lahu biwaladihi waAAal a alw a rithi mithlu tha lika fain ar a d a fis alan AAan tar ad in minhuma watas h awurin fal a jun ah a AAalayhim a wain aradtum an tastar d iAAoo awl a dakum fal a jun ah a AAalaykum i tha sallamtum m a a taytum bialmaAAroofi wa i ttaqoo All a ha waiAAlamoo anna All a ha bim a taAAmaloona ba s eer un

Verse 233 (English):
Mothers may breastfeed their children two complete years for whoever wishes to complete the nursing [period]. Upon the father is the mothers’ provision and their clothing according to what is acceptable. No person is charged with more than his capacity. No mother should be harmed through her child, and no father through his child. And upon the [father’s] heir is [a duty] like that [of the father]. And if they both desire weaning through mutual consent from both of them and consultation, there is no blame upon either of them. And if you wish to have your children nursed by a substitute, there is no blame upon you as long as you give payment according to what is acceptable. And fear Allah and know that Allah is Seeing of what you do.

Verse 234 (Arabic):
وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ

Verse 234 (Transliteration):
Wa(a)lla th eena yutawaffawna minkum waya th aroona azw a jan yatarabba s na bianfusihinna arbaAAata ashshuhuri waAAashran fai tha balaghna ajalahunna fal a jun ah a AAalaykum fee m a faAAalna fee anfusihinna bialmaAAroofi wa(A)ll a hu bim a taAAmaloona khabeer un

Verse 234 (English):
And those who are taken in death among you and leave wives behind – they, [the wives, shall] wait four months and ten [days]. And when they have fulfilled their term, then there is no blame upon you for what they do with themselves in an acceptable manner. And Allah is [fully] Aware of what you do.

Verse 235 (Arabic):
وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُم بِهِ مِنْ خِطْبَةِ النِّسَاءِ أَوْ أَكْنَنتُمْ فِي أَنفُسِكُمْ ۚ عَلِمَ اللَّهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّا أَن تَقُولُوا قَوْلًا مَّعْرُوفًا ۗ وَلَا تَعْزِمُوا عُقْدَةَ النِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبْلُغَ الْكِتَابُ أَجَلَهُ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي أَنفُسِكُمْ فَاحْذَرُوهُ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ

Verse 235 (Transliteration):
Wal a jun ah a AAalaykum feem a arra d tum bihi min khi t bahti a l nnis a i aw aknantum fee anfusikum AAalima All a hu annakum satadhkuroonahunna wal a kin l a tuw a AAidoohunna sirran ill a an taqooloo qawlan maAAroofan wal a taAAzimoo AAuqdata a(l)nnik a hi h att a yablugha alkit a bu ajalahu wa(i)AAlamoo anna All a ha yaAAlamu m a fee anfusikum fai hth a roohu waiAAlamoo anna All a ha ghafoorun h aleem un

Verse 235 (English):
There is no blame upon you for that to which you [indirectly] allude concerning a proposal to women or for what you conceal within yourselves. Allah knows that you will have them in mind. But do not promise them secretly except for saying a proper saying. And do not determine to undertake a marriage contract until the decreed period reaches its end. And know that Allah knows what is within yourselves, so beware of Him. And know that Allah is Forgiving and Forbearing.

Verse 236 (Arabic):
لَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا لَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى الْمُوسِعِ قَدَرُهُ وَعَلَى الْمُقْتِرِ قَدَرُهُ مَتَاعًا بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُحْسِنِينَ

Verse 236 (Transliteration):
L a jun ah a AAalaykum in t allaqtumu a l nnis a a m a lam tamassoo hunna aw tafri d oo lahunna faree d atan wamattiAAoohunna AAal a almoosiAAi qadaruhu waAAal a almuq t iri qadaruhu mat a AAan bialmaAAroofi h aqqan AAal a almu h sineen(a)

Verse 236 (English):
There is no blame upon you if you divorce women you have not touched nor specified for them an obligation. But give them [a gift of] compensation – the wealthy according to his capability and the poor according to his capability – a provision according to what is acceptable, a duty upon the doers of good.

Verse 237 (Arabic):
وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إَلَّا أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَ الَّذِي بِيَدِهِ عُقْدَةُ النِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا الْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ

Verse 237 (Transliteration):
Wa-in t allaqtumoohunna min qabli an tamassoohunna waqad fara d tum lahunna faree d atan fani s fu m a fara d tum ill a an yaAAfoo na aw yaAAfuwa alla th ee biyadihi AAuqdatu a(l)nnik a hi waan taAAfoo aqrabu li(l)ttaqw a wal a tansawoo alfadla baynakum inna All a ha bim a taAAmaloona ba s eer(un)

Verse 237 (Arabic):
وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إَلَّا أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَ الَّذِي بِيَدِهِ عُقْدَةُ النِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا الْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ

Verse 237 (Transliteration):
और यदि तुम उन्हें छूने से पहले ही तलाक दे देते हो और तुमने पहले से ही उनके लिए एक दायित्व निर्दिष्ट कर दिया है, तो जो तुमने निर्दिष्ट किया है उसका आधा (दे) – जब तक कि वे अधिकार न छोड़ दें या जिसके हाथ में विवाह अनुबंध है वह इसे छोड़ न दे। और इसे त्याग देना धार्मिकता के अधिक निकट है। और अपने बीच शालीनता को मत भूलना. निस्संदेह, जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है।

Verse 237 (English):
And if you divorce them before you have touched them and you have already specified for them an obligation, then [give] half of what you specified – unless they forego the right or the one in whose hand is the marriage contract foregoes it. And to forego it is nearer to righteousness. And do not forget graciousness between you. Indeed Allah, of whatever you do, is Seeing.

Verse 238 (Arabic):
حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَىٰ وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ

Verse 238 (Transliteration):
[अनिवार्य] प्रार्थनाओं और [विशेष रूप से] मध्य प्रार्थना को सावधानी से बनाए रखें और निष्ठापूर्वक आज्ञाकारी होकर अल्लाह के सामने खड़े हों।

Verse 238 (English):
Maintain with care the [obligatory] prayers and [in particular] the middle prayer and stand before Allah, devoutly obedient.

Verse 239 (Arabic):
فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا ۖ فَإِذَا أَمِنتُمْ فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ

Verse 239 (Transliteration):
परन्तु यदि तुम्हें [किसी शत्रु से] डर हो तो पैदल या सवार होकर नमाज़ पढ़ो। परन्तु जब तुम निश्चिन्त हो जाओ, तो अल्लाह को याद करो, क्योंकि उस ने तुम्हें वह बात सिखा दी है, जो तुम नहीं जानते थे।

Verse 239 (English):
But if you fear [an enemy], then pray on foot or riding. But when you are secure, then remember Allah [in prayer], as He has taught you that which you did not [previously] know.

Verse 240 (Arabic):
وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ

Verse 240 (Transliteration):
और जो लोग तुम में से मृत्यु के घाट उतार दिए जाएं और अपनी पत्नियों को छोड़ जाएं, तो उनकी पत्नियों के लिए वसीयत कर दी जाएगी, अर्थात् उन्हें बिना त्यागे एक वर्ष तक भरण-पोषण दिया जाएगा। परन्तु यदि वे [अपनी इच्छा से] चले जाएं, तो जो कुछ वे अपने साथ ग्रहणयोग्य रीति से करते हैं, उस में तुम पर कोई दोष नहीं। और अल्लाह प्रभुत्वशाली और बुद्धिमान है।

Verse 240 (English):
And those who are taken in death among you and leave wives behind – for their wives is a bequest: maintenance for one year without turning [them] out. But if they leave [of their own accord], then there is no blame upon you for what they do with themselves in an acceptable way. And Allah is Exalted in Might and Wise.

Verse 240 (Arabic):
وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ

Verse 240 (Transliteration):
और जो लोग तुम में से मृत्यु के घाट उतार दिए जाएं और अपनी पत्नियों को छोड़ जाएं, तो उनकी पत्नियों के लिए वसीयत कर दी जाएगी, अर्थात् उन्हें बिना त्यागे एक वर्ष तक भरण-पोषण दिया जाएगा। परन्तु यदि वे [अपनी इच्छा से] चले जाएं, तो जो कुछ वे अपने साथ ग्रहणयोग्य रीति से करते हैं, उस में तुम पर कोई दोष नहीं। और अल्लाह प्रभुत्वशाली और बुद्धिमान है।

Verse 240 (English):
And those who are taken in death among you and leave wives behind – for their wives is a bequest: maintenance for one year without turning [them] out. But if they leave [of their own accord], then there is no blame upon you for what they do with themselves in an acceptable way. And Allah is Exalted in Might and Wise.

Verse 241 (Arabic):
وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ

Verse 241 (Transliteration):
और तलाक़शुदा स्त्रियों के लिए जो स्वीकार्य है उसके अनुसार प्रावधान है – धर्मियों पर एक कर्तव्य।

Verse 241 (English):
And for divorced women is a provision according to what is acceptable – a duty upon the righteous.

Verse 242 (Arabic):
كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ

Verse 242 (Transliteration):
इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें स्पष्ट करता है ताकि तुम तर्क से काम लो।

Verse 242 (English):
Thus does Allah make clear to you His verses that you might use reason.

Verse 243 (Arabic):
أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ خَرَجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ اللَّهُ مُوتُوا ثُمَّ أَحْيَاهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ

Verse 243 (Transliteration):
और अल्लाह की राह में लड़ो और जान लो कि अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

Verse 243 (English):
Have you not considered those who left their homes in many thousands, fearing death? Allah said to them, “Die”; then He restored them to life. And Allah is full of bounty to the people, but most of the people do not show gratitude.

Verse 244 (Arabic):
وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

Verse 244 (Transliteration):
और अल्लाह की राह में लड़ो और जान लो कि अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

Verse 244 (English):
And fight in the cause of Allah, and know that Allah is Hearing and Knowing.

Verse 245 (Arabic):
أَلَمْ تَرَ إِلَى الْمَلَإِ مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ مِن بَعْدِ مُوسَىٰ إِذْ قَالُوا لِنَبِيٍّ لَّهُمُ ابْعَثْ لَنَا مَلِكًا نُّقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۖ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِن كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ أَلَّا تُقَاتِلُوا ۖ قَالُوا وَمَا لَنَا أَلَّا نُقَاتِلَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِن دِيَارِنَا وَأَبْنَائِنَا ۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ تَوَلَّوْا إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ

Verse 245 (Transliteration):
क्या तुमने मूसा के बाद बनी इस्राईल की सभा पर विचार नहीं किया, जब उन्होंने अपने नबी से कहा, “हमारे पास एक राजा भेजो, और हम अल्लाह की राह में लड़ेंगे”? उन्होंने कहा, “यदि युद्ध तुम्हारे लिए निर्धारित किया गया हो तो क्या तुम संभवतः युद्ध करने से बचोगे?” उन्होंने कहा, “और हम अल्लाह की राह में क्यों न लड़ें, जबकि हमें अपने घरों और अपने बच्चों से निकाल दिया गया है?” परन्तु जब उन पर युद्ध करना अनिवार्य कर दिया गया तो उनमें से कुछ को छोड़ कर वे मुँह मोड़ गये। और अल्लाह ज़ालिमों को जानने वाला है।

Verse 245 (English):
Have you not considered the assembly of the Children of Israel after [the time of] Moses when they said to a prophet of theirs, “Send to us a king, and we will fight in the way of Allah”? He said, “Would you perhaps refrain from fighting if fighting was prescribed for you?” They said, “And why should we not fight in the cause of Allah when we have been driven out from our homes and from our children?” But when fighting was prescribed for them, they turned away, except for a few of them. And Allah is Knowing of the wrongdoers.

Verse 246 (Arabic):
وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ اللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًا ۚ قَالُوا أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ الْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِالْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةً مِّنَ الْمَالِ ۚ قَالَ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ ۖ وَاللَّهُ يُؤْتِي مُلْكَهُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ

Verse 246 (Transliteration):
और उनके नबी ने उनसे कहा, “वास्तव में, अल्लाह ने तुम्हारे पास शाऊल को राजा बनाकर भेजा है।” उन्होंने कहा, वह हम पर राज्य कैसे कर सकता है, जबकि हम उस से अधिक राज्य करने के योग्य हैं और उसे कुछ भी धन नहीं दिया गया? उन्होंने कहा, “वास्तव में, अल्लाह ने उसे तुम्हारे ऊपर चुन लिया है और उसे ज्ञान और कद में बहुत बढ़ा दिया है। और अल्लाह जिसे चाहता है उसे अपनी प्रभुता प्रदान करता है। और अल्लाह सर्वव्यापी और जानने वाला है।”

Verse 246 (English):
And their prophet said to them, “Indeed, Allah has sent to you Saul as a king.” They said, “How can he have kingship over us while we are more worthy of kingship than him and he has not been given any measure of wealth?” He said, “Indeed, Allah has chosen him over you and has increased him abundantly in knowledge and stature. And Allah gives His sovereignty to whom He wills. And Allah is all-Encompassing [in favor] and Knowing.

Verse 247 (Arabic):
وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ آيَةَ مُلْكِهِ أَن يَأْتِيَكُمُ التَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌ مِّمَّا تَرَكَ آلُ مُوسَىٰ وَآلُ هَارُونَ تَحْمِلُهُ الْمَلَائِكَةُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 247 (Transliteration):
उनके नबी ने उनसे कहा, “उसकी बादशाही की निशानी यह है कि वह सन्दूक तुम्हारे पास आएगा जिसमें तुम्हारे रब की ओर से आश्वासन होगा और जो कुछ मूसा के परिवार और हारून के परिवार ने छोड़ दिया था, उसका एक अवशेष स्वर्गदूतों द्वारा ले जाया जाएगा।” यदि तुम ईमानवाले हो तो निस्संदेह यह तुम्हारे लिए एक निशानी है।

Verse 247 (English):
Their prophet said to them, “Indeed, a sign of his kingship is that the chest will come to you in which is assurance from your Lord and a remnant of what the family of Moses and the family of Aaron had left, carried by the angels. Indeed in that is a sign for you, if you are believers.”

Verse 248 (Arabic):
فَلَمَّا فَصَلَتْ طَائِفَةٌ مِّنْهُمْ أَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ طَائِفَةٍ وَكَانُوا حَزْبًا مُّكْتَسِلِينَ

Verse 248 (Transliteration):
और जब शाऊल सिपाहियों के साथ निकला, तो उसने कहा, “निश्चय अल्लाह एक नदी के द्वारा तुम्हारी परीक्षा करेगा। तो जो कोई उसमें से पीए, वह मेरा नहीं, और जो कोई उसका स्वाद न चखे, वह सचमुच मेरा ही है, सिवाय उस के जो पी ले।” इससे] उसके हाथ के खोखले हिस्से में।” परन्तु उन्होंने उसमें से पी लिया, सिवाय उन में से थोड़े से लोगों को छोड़ कर। फिर जब वह अपने साथ विश्वास करनेवालोंसमेत उसे पार कर गया, तो उन्होंने कहा, “आज गोलियत और उसके सैनिकों के साम्हने हमारा कुछ भी सामर्थ्य नहीं।” लेकिन जो लोग आश्वस्त थे कि वे अल्लाह से मिलेंगे, उन्होंने कहा, “अल्लाह की अनुमति से एक छोटी कंपनी ने कितनी बड़ी कंपनी पर विजय प्राप्त की है। और अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है।”

Verse 248 (English):
And when Saul went forth with the soldiers, he said, “Indeed, Allah will be testing you with a river. So whoever drinks from it is not of me, and whoever does not taste it is indeed of me, excepting one who takes [from it] in the hollow of his hand.” But they drank from it, except a [very] few of them. Then when he had crossed it along with those who believed with him, they said, “There is no power for us today against Goliath and his soldiers.” But those who were certain that they would meet Allah said, “How many a small company has overcome a large company by permission of Allah. And Allah is with the patient.”

Verse 249 (Arabic):
وَلَمَّا بَرَزُوا لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِ قَالُوا رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

Verse 249 (Transliteration):
और जब वे गोलियथ और उसके सैनिकों का सामना करने के लिए आगे बढ़े, तो उन्होंने कहा, “हमारे भगवान, हम पर धैर्य रखें और हमारे पैरों को मजबूती से स्थापित करें और हमें अविश्वासी लोगों पर विजय प्रदान करें।”

Verse 249 (English):
And when they went forth to [face] Goliath and his soldiers, they said, “Our Lord, pour upon us patience and plant firmly our feet and give us victory over the disbelieving people.”

Verse 250 (Arabic):
فَهَزَمُوهُم بِإِذْنِ اللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُودُ جَالُوتَ وَآتَاهُ اللَّهُ الْمُلْكَ وَالْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُ مِمَّا يَشَاءُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ اللَّهِ النَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍ لَّفَسَدَتِ الْأَرْضُ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى الْعَالَمِينَ

Verse 251 (Arabic):
تِلْكَ آيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۗ وَإِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ

Verse 251 (Transliteration):
ये अल्लाह की आयतें हैं जो हम तुम्हें सच में सुनाते हैं, [हे मुहम्मद]। और निश्चय ही तुम सन्देशवाहकों में से हो।

Verse 251 (English):
These are the verses of Allah which We recite to you, [O Muhammad], in truth. And indeed, you are from among the messengers.

Verse 252 (Arabic):
تِلْكَ الرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۘ مِّنْهُم مَّن كَلَّمَ اللَّهُ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَاتٍ ۚ وَآتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ ۗ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلَ الَّذِينَ مِن بَعْدِهِم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ وَلَٰكِنِ اخْتَلَفُوا فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ وَمِنْهُم مَّن كَفَرَ ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلُوا وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ

Verse 252 (Transliteration):
ये संदेशवाहक हैं. हमने उनमें से कुछ को दूसरों पर प्राथमिकता दी। उनमें वे लोग भी थे जिनसे अल्लाह ने बात की, और उसने उनमें से कुछ को डिग्री में बढ़ा दिया। और हमने मरियम के बेटे यीशु को स्पष्ट प्रमाण दिए और हमने पवित्र आत्मा से उसकी सहायता की। यदि अल्लाह चाहता तो उनके बाद आने वाली पीढ़ियाँ स्पष्ट प्रमाण आ जाने के बाद आपस में न लड़तीं। परन्तु उनमें मतभेद हो गया और उनमें से कुछ ईमान लाये और कुछ ने इनकार किया। और यदि अल्लाह चाहता तो वे आपस में न लड़ते, परन्तु अल्लाह जो चाहता है वही करता है।

Verse 252 (English):
These are the messengers. We preferred some of them over others. Among them were those to whom Allah spoke, and He raised some of them in degree. And We gave Jesus, the son of Mary, clear proofs, and We supported him with the Pure Spirit. If Allah had willed, those [generations] succeeding them would not have fought each other after the clear proofs had come to them. But they differed, and some of them believed and some of them disbelieved. And if Allah had willed, they would not have fought each other, but Allah does what He intends.

Verse 253 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ ۗ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ

Verse 253 (Transliteration):
ऐ ईमान वालो, जो कुछ हमने तुम्हें दिया है उसमें से खर्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें कोई लेन-देन नहीं होगा, कोई दोस्ती नहीं होगी और कोई हिमायत नहीं होगी। और जो काफ़िर हैं, वही ज़ालिम हैं।

Verse 253 (English):
O you who have believed, spend from what We have provided for you before there comes a Day in which there is no exchange and no friendship and no intercession. And the disbelievers – they are the wrongdoers.

Verse 254 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ ۗ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ

Verse 254 (Transliteration):
ऐ ईमान वालो, जो कुछ हमने तुम्हें दिया है उसमें से खर्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें कोई लेन-देन नहीं होगा, कोई दोस्ती नहीं होगी और कोई हिमायत नहीं होगी। और जो काफ़िर हैं, वही ज़ालिम हैं।

Verse 254 (English):
O you who have believed, spend from what We have provided for you before there comes a Day in which there is no exchange and no friendship and no intercession. And the disbelievers – they are the wrongdoers.

Verse 255 (Arabic):
اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ

Verse 255 (Transliteration):
अल्लाह – उसके अलावा कोई देवता नहीं है, जो सदैव जीवित है, [सभी] सिद्धांत का पालनकर्ता है। न तो उनींदापन उसे बस्ता है और न ही नींद। वही का वही है जो कुछ आकाश में है और जो कुछ धरती पर है। वह कौन है जो अपने संस्करणों के बिना अपनी पसंद के अनुसार कर सकता है? वह जानती है कि वे सामने क्या हैं और उनके बाद क्या होगा, और वे अपने ज्ञान की कोई भी चीज़ अपने कमरे में नहीं लेते, इस बात पर सहमत हैं कि वह जो चाहती है। उसकी कुर्सी आकाश और पृथ्वी तक की फोटो खींची गई है, और उसकी सुरक्षा उसे थका नहीं पाती है। और वह परमप्रधान, परम महान है।

Verse 255 (English):
Allah – there is no deity except Him, the Ever-Living, the Sustainer of [all] existence. Neither drowsiness overtakes Him nor sleep. To Him belongs whatever is in the heavens and whatever is on the earth. Who is it that can intercede with Him except by His permission? He knows what is [presently] before them and what will be after them, and they encompass not a thing of His knowledge except for what He wills. His Kursi extends over the heavens and the earth, and their preservation tires Him not. And He is the Most High, the Most Great.

Verse 256 (Arabic):
لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَيِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِن بِاللَّهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ لَا انفِصَامَ لَهَا ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

Verse 256 (Transliteration):
धर्म को स्वीकार करने में कोई बाध्यता नहीं होगी। ग़लत से सही रास्ता स्पष्ट हो गया है। तो जो कोई भी ताग़ुत पर अविश्वास करता है और अल्लाह पर विश्वास करता है उसने सबसे भरोसेमंद हाथ पकड़ लिया है जिसका कोई तोड़ नहीं है। और अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

Verse 256 (English):
There shall be no compulsion in [acceptance of] the religion. The right course has become clear from the wrong. So whoever disbelieves in Taghut and believes in Allah has grasped the most trustworthy handhold with no break in it. And Allah is Hearing and Knowing.

Verse 257 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَمْنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنزَلَ مِن قَبْلُ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا

Verse 257 (Transliteration):
Y a ayyuh a alla th eena a manoo aminoo bi(A)ll a hi warasoolihi wa(a)lkit a bi alla th ee nazzala AAal a rasoolihi wa(a)lkit a bi alla th ee anzala min qablu waman yakfur bi(A)ll a hi wamal a ikatihi wakutubihi warusulihi wa(a)lyawmi al a khiri faqad d alla d al a lan baAAeed a(n)

Verse 257 (English):
O you who have believed, believe in Allah and His Messenger and the Book that He sent down upon His Messenger and the Scripture which He sent down before. And whoever disbelieves in Allah, His angels, His books, His messengers, and the Last Day has certainly gone far astray.

Verse 258 (Arabic):
أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِي حَاجَّ إِبْرَاهِيمَ فِي رَبِّهِ أَنْ آتَاهُ اللَّهُ الْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّيَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا أُحْيِي وَأُمِيتُ ۖ قَالَ إِبْرَاهِيمُ فَإِنَّ اللَّهَ يَأْتِي بِالشَّمْسِ مِنَ الْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ الْمَغْرِبِ فَبُهِتَ الَّذِي كَفَرَ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ

Verse 258 (Transliteration):
Alam tara il a alla th ee h a jja ibr a heema fee rabbihi an a t a hu All a hu almulka i th q a la ibr a heemu rabbiya alla th ee yu h yee wayumeetu q a la an a o h yee waom eetu q a la ibr a heemu fainna All a ha yatee bi(al)shshamsi mina al mashriqi fa o tibih a mina almaghribi fabuhita alla th ee kafara wa(A)ll a hu l a yahdee alqawma a(l) thth a limeen(a)

Verse 258 (English):
Have you not considered the one who argued with Abraham about his Lord [merely] because Allah had given him kingship? When Abraham said, “My Lord is the one who gives life and causes death,” he said, “I give life and cause death.” Abraham said, “Indeed, Allah brings up the sun from the east, so bring it up from the west.” So the disbeliever was overwhelmed [by astonishment], and Allah does not guide the wrongdoing people.

Verse 259 (Arabic):
أَوْ كَالَّذِي مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍ وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْيِي هَٰذِهِ اللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ اللَّهُ مِائَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِائَةَ عَامٍ فَانظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَانظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ ۖ وَلِنَجْعَلَكَ آيَةً لِّلنَّاسِ ۖ وَانظُرْ إِلَى الْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ قَالَ أَعِيدُونِي ۖ فَأَلَىٰهُ اللَّهُ مِائَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُ ۗ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ ۗ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِائَةَ عَامٍ فَانظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَانظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ ۖ وَلِنَجْعَلَكَ آيَةً لِّلنَّاسِ وَانظُرْ إِلَى الْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا ۚ وَإِذَا تَبَيَّنَ لَهُمْ قَالَوْا حَدَا مَجْحَفُ اللَّهِ ۖ وَإِنَّا إِلَىٰهِ رَاجِعُونَ

Verse 259 (Transliteration):
या [ऐसे उदाहरण पर विचार करें] जैसे कि वह एक ऐसी बस्ती से गुज़रा जो खंडहर हो गई थी। उन्होंने कहा, “अल्लाह इसे मरने के बाद कैसे जीवित करेगा?” तो अल्लाह ने उसे सौ वर्ष के लिये मरवा डाला; तब उसने उसे पुनर्जीवित किया। उसने कहा, “कब तक रहे?” उस आदमी ने कहा, “मैं एक दिन या एक दिन का हिस्सा रह गया हूं।” उसने कहा, “बल्कि तुम एक सौ वर्ष तक जीवित रहे। अपने खाने-पीने की ओर देखो; समय के साथ कोई परिवर्तन नहीं हुआ। और अपने गधे की ओर देखो; और हम तुम्हें लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे। और हड्डियों को देखो [इस गधे के बारे में] – हम उन्हें कैसे पालते हैं और फिर उन्हें मांस से ढक देते हैं।” जब यह उस पर स्पष्ट हो गया, तो उसने कहा, “मैं जानता हूं कि अल्लाह हर चीज़ पर सक्षम है।”

Verse 259 (English):
Or [consider such an example] as the one who passed by a township which had fallen into ruin. He said, “How will Allah bring this to life after its death?” So Allah caused him to die for a hundred years; then He revived him. He said, “How long have you remained?” The man said, “I have remained a day or part of a day.” He said, “Rather, you have remained one hundred years. Look at your food and your drink; it has not changed with time. And look at your donkey; and We will make you a sign for the people. And look at the bones [of this donkey] – how We raise them and then We cover them with flesh.” When it became clear to him, he said, “I know that Allah is over all things competent.”

Verse 260 (Arabic):
وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِي الْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِي ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِّنَ الطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ اجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍ مِّنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ادْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا ۚ وَاعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ

Verse 260 (Transliteration):
और [उल्लेख करें] जब इब्राहीम ने कहा, “मेरे भगवान, मुझे दिखाओ कि तुम मृतकों को कैसे जीवन देते हो।” [अल्लाह] ने कहा, “क्या तुम ईमान नहीं लाए?” उन्होंने कहा, “हां, लेकिन [मैं पूछता हूं] केवल इसलिए कि मेरा दिल संतुष्ट हो जाए।” [अल्लाह] ने कहा, “चार पक्षियों को ले जाओ और उन्हें अपने पास ले लो। फिर (उन्हें वध करने के बाद) प्रत्येक पहाड़ी पर उनका एक हिस्सा रखो; फिर उन्हें बुलाओ – वे जल्दी से तुम्हारे पास आएंगे। और जान लो कि अल्लाह है पराक्रम में श्रेष्ठ और बुद्धिमान।”

Verse 260 (English):
And [mention] when Abraham said, “My Lord, show me how You give life to the dead.” [Allah] said, “Have you not believed?” He said, “Yes, but [I ask] only that my heart may be satisfied.” [Allah] said, “Take four birds and commit them to yourself. Then [after slaughtering them] put on each hill a portion of them; then call them – they will come [flying] to you in haste. And know that Allah is Exalted in Might and Wise.”

Verse 261 (Arabic):
مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ

Verse 261 (Transliteration):
जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में खर्च करते हैं उनकी मिसाल उस बीज की तरह है जिसमें सात बालियाँ उगती हैं; प्रत्येक स्पाइक में सौ दाने होते हैं। और अल्लाह जिसके लिए चाहता है उसे बढ़ा देता है। और अल्लाह सर्वव्यापी और जानने वाला है।

Verse 261 (English):
The example of those who spend their wealth in the way of Allah is like a seed [of grain] which grows seven spikes; in each spike is a hundred grains. And Allah multiplies [His reward] for whom He wills. And Allah is all-Encompassing and Knowing.

Verse 262 (Arabic):
الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَا أَنفَقُوا مَنًّا وَلَا أَذًى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

Verse 262 (Transliteration):
जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं और फिर जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया है उसके बाद याद दिलाना या (अन्य) नुक्सान नहीं पहुँचाते, उनका इनाम उनके रब के पास होगा, और उनके बारे में कोई डर नहीं होगा और न ही होगा वे शोक मनाते हैं.

Verse 262 (English):
Those who spend their wealth in the way of Allah and then do not follow up what they have spent with reminders [of it] or [other] injury will have their reward with their Lord, and there will be no fear concerning them, nor will they grieve.

Verse 263 (Arabic):
قَوْلٌ مَّعْرُوفٌ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌ مِّن صَدَقَةٍ يَتْبَعُهَا أَذًى ۗ وَاللَّهُ غَنِيٌّ حَلِيمٌ

Verse 263 (Transliteration):
दयालु वाणी और क्षमा, चोट के बाद दिए गए दान से बेहतर है। और अल्लाह आवश्यकता से रहित और सहनशील है।

Verse 263 (English):
Kind speech and forgiveness are better than charity followed by injury. And Allah is Free of need and Forbearing.

Verse 264 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُبْطِلُوا صَدَقَاتِكُم بِالْمَنِّ وَالْأَذَىٰ كَالَّذِي يُنفِقُ مَالَهُ رِئَاءَ النَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌ فَأَصَابَهُ وَابِلٌ فَتَرَكَهُ صَلْدًا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَيْءٍ مِّمَّا كَسَبُوا ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

Verse 264 (Transliteration):
ऐ ईमान वालो, अपने दान को अनुस्मारक या चोट के द्वारा अमान्य न करो जैसा कि वह व्यक्ति करता है जो अपना धन [केवल] लोगों को दिखाने के लिए खर्च करता है और अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान नहीं रखता। उसका उदाहरण एक [बड़े] चिकने पत्थर की तरह है जिस पर धूल है और भारी बारिश के कारण वह नंगा हो जाता है। उन्होंने जो कुछ कमाया है उसमें से कुछ भी रखने में असमर्थ हैं। और अल्लाह इनकार करनेवालों को मार्ग नहीं दिखाता।

Verse 264 (English):
O you who have believed, do not invalidate your charities with reminders or injury as does one who spends his wealth [only] to be seen by the people and does not believe in Allah and the Last Day. His example is like that of a [large] smooth stone upon which is dust and is hit by a downpour that leaves it bare. They are unable [to keep] anything of what they have earned. And Allah does not guide the disbelieving people.

Verse 265 (Arabic):
وَمَثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ وَتَثْبِيتًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ كَمَثَلِ جَنَّةٍ بِرَبْوَةٍ أَصَابَهَا وَابِلٌ فَآتَتْ أُكُلَهَا ضِعْفَيْنِ فَإِن لَّمْ يُصِبْهَا وَابِلٌ فَطَلٌّ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ

Verse 265 (Transliteration):
और उन लोगों का उदाहरण जो अपने धन को अल्लाह की मंजूरी के लिए और खुद को आश्वस्त करने के लिए खर्च करते हैं, यह ऊंचे स्थान पर एक बगीचे की तरह है जो भारी बारिश से प्रभावित होता है – इसलिए वह अपने फल को दोगुना कर देता है। और [यहाँ तक कि] अगर भारी बारिश न हो, तो बूंदाबांदी [पर्याप्त है]। और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा है।

Verse 265 (English):
And the example of those who spend their wealth seeking means to the approval of Allah and assuring [reward for] themselves is like a garden on high ground which is hit by a downpour – so it yields its fruits in double. And [even] if it is not hit by a downpour, then a drizzle [is sufficient]. And Allah, of what you do, is Seeing.

Verse 266 (Arabic):
أَيُرِيدُ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ لَهُ فِيهَا مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَأَصَابَهُ الْكِبَرُ وَلَهُ ذُرِّيَّةٌ ضُعَفَاءُ فَأَصَابَهَا إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ فَاحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ

Verse 266 (Transliteration):
क्या तुम में से कोई चाहता है कि उसके लिए खजूर और बेलों वाला एक बगीचा हो, जिसके नीचे नदियाँ बहती हों और उसमें उसके लिए हर तरह के फल हों, जबकि वह बुढ़ापे से घिर गया हो, और उसके बच्चे कमज़ोर हों (अपनी देखभाल करने में असमर्थ हों) ), फिर उस पर तेज़ बवंडर मारा जाता है, जिससे वह जल जाता है? इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे सामने अपनी आयतें (प्रमाण, प्रमाण, आयतें) स्पष्ट कर देता है ताकि तुम विचार करो।

Verse 266 (English):
Does any of you wish to have a garden with date-palms and vines, with rivers flowing underneath, and all kinds of fruits for him therein, while he is struck with old age, and his children are weak (not able to look after themselves), then it is struck with a fiery whirlwind, so that it is burnt? Thus Allah makes clear His Ayat (proofs, evidences, verses) to you that you may give thought.

Verse 267 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنفِقُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّا أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ الْأَرْضِ ۖ وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنفِقُونَ وَلَسْتُم بِآخِذِيهِ إِلَّا أَن تُغْمِضُوا فِيهِ ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ حَمِيدٌ

Verse 267 (Transliteration):
ऐ ईमान वालो, जो अच्छी चीज़ें तुमने कमाई हैं उनमें से ख़र्च करो और जो कुछ हमने तुम्हारे लिए ज़मीन से पैदा किया है उसमें से ख़र्च करो। और उस में से ख़र्च करने की नियति न करो, जब तक कि तुम उसे अपनी आँखें बंद किए बिना न लो। और जान लो कि अल्लाह आवश्यकता से रहित और प्रशंसनीय है।

Verse 267 (English):
O you who have believed, spend from the good things which you have earned and from that which We have produced for you from the earth. And do not aim toward the defective therefrom to spend [from that] while you would not take it [yourself] except with closed eyes. And know that Allah is Free of need and Praiseworthy.

Verse 268 (Arabic):
الشَّيْطَانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِالْفَحْشَاءِ ۖ وَاللَّهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةً مِّنْهُ وَفَضْلًا ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ

Verse 268 (Transliteration):
शैतान आपको गरीबी की धमकी देता है और अनैतिकता का आदेश देता है, जबकि अल्लाह आपको अपनी ओर से क्षमा और इनाम देने का वादा करता है। और अल्लाह सर्वव्यापी और जानने वाला है।

Verse 268 (English):
Satan threatens you with poverty and orders you to immorality, while Allah promises you forgiveness from Him and bounty. And Allah is all-Encompassing and Knowing.

Verse 269 (Arabic):
يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ

Verse 269 (Transliteration):
वह जिसे चाहता है बुद्धि देता है, और जिसे बुद्धि दी गई है, उसे निश्चय ही बहुत भलाई दी गई है। और कोई याद न करेगा सिवाय समझ वालों के।

Verse 269 (English):
He gives wisdom to whom He wills, and whoever has been given wisdom has certainly been given much good. And none will remember except those of understanding.

Sure, here are the translations of Surah Al-Baqarah, verses 270 to 275:

Verse 270 (Arabic):
وَمَا أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُهُ ۗ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ

Verse 270 (Transliteration):
और जो कुछ तुम ख़र्च करते हो या मन्नतें मानते हो, निस्संदेह अल्लाह उसे जानता है। और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं।

Verse 270 (English):
And whatever you spend of expenditures or make of vows – indeed, Allah knows of it. And for the wrongdoers there are no helpers.

Verse 271 (Arabic):
إِن تُبْدُوا الصَّدَقَاتِ فَنِعِمَّا هِيَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا الْفُقَرَاءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّئَاتِكُمْ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ

Verse 271 (Transliteration):
यदि आप अपने धर्मार्थ व्यय का खुलासा करते हैं, तो वे अच्छे हैं; परन्तु यदि तुम उन्हें छिपाकर कंगालों को बाँट दो, तो यह तुम्हारे लिये अच्छा है, और वह तुम्हारे कुछ बुरे कामों को तुम से दूर कर देगा। और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उस से बाख़बर है।

Verse 271 (English):
If you disclose your charitable expenditures, they are good; but if you conceal them and give them to the poor, it is better for you, and He will remove from you some of your misdeeds [thereby]. And Allah, with what you do, is [fully] Acquainted.

Verse 272 (Arabic):
لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَاهُمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ

Verse 272 (Transliteration):
उनके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी तुम पर नहीं है, [हे मुहम्मद], बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है मार्गदर्शन देता है। और जो कुछ तुम (ईमानवाले) ख़र्च करते हो, वह तुम्हारे लिए ही ख़र्च करते हो, और तुम अल्लाह की प्रसन्नता के अलावा कुछ भी ख़र्च नहीं करते हो। और जो कुछ तुम भलाई में खर्च करोगे, वह तुम्हें पूरा चुकाया जाएगा, और तुम पर कोई अत्याचार न किया जाएगा।

Verse 272 (English):
Not upon you, [O Muhammad], is [responsibility for] their guidance, but Allah guides whom He wills. And whatever good you [believers] spend is for yourselves, and you do not spend except seeking the countenance of Allah. And whatever you spend of good – it will be fully repaid to you, and you will not be wronged.

Verse 273 (Arabic):
لِّلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُحْصِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ ۚ يَحْسَبُهُمُ الْجَاهِلُ أَغْنِيَاءَ مِنَ التَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَاهُمْ ۟ لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ

Verse 273 (Transliteration):
[दान] उन गरीबों के लिए है जिन्हें अल्लाह के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया है, जो भूमि में घूमने में असमर्थ हैं। एक अज्ञानी [व्यक्ति] उन्हें उनके संयम के कारण आत्मनिर्भर समझेगा, लेकिन आप उन्हें उनके [विशेषता] संकेत से पहचान लेंगे। वे लोगों से लगातार [या बिल्कुल भी] नहीं पूछते। और जो कुछ तुम भलाई में ख़र्च करते हो, निस्संदेह अल्लाह उसे जानने वाला है।

Verse 273 (English):
[Charity is] for the poor who have been restricted for the cause of Allah, unable to move about in the land. An ignorant [person] would think them self-sufficient because of their restraint, but you will know them by their [characteristic] sign. They do not ask people persistently [or at all]. And whatever you spend of good – indeed, Allah is Knowing of it.

Verse 274 (Arabic):
الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُم بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ سِرًّا وَعَلَانِيَةً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

Verse 274 (Transliteration):
जो लोग अपना माल [अल्लाह की राह में] रात और दिन में, गुप्त रूप से और सार्वजनिक रूप से खर्च करते हैं, उन्हें अपने भगवान के पास अपना इनाम मिलेगा। और उन पर कोई भय न रहेगा, और न वे शोक करेंगे।

Verse 274 (English):
Those who spend their wealth [in Allah ‘s way] by night and by day, secretly and publicly – they will have their reward with their Lord. And no fear will there be concerning them, nor will they grieve.

Verse 275 (Arabic):
الَّذِينَ يَأْكُلُونَ الرِّبَا لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ الَّذِي يَتَخَبَّطُهُ الشَّيْطَانُ مِنَ الْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا إِنَّمَا الْبَيْعُ مِثْلُ الرِّبَا ۗ وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ الرِّبَا ۚ فَمَن جَاءَهُ مَوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّهِ فَانتَهَىٰ فَلَهُ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُ إِلَى اللَّهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

Verse 275 (Transliteration):
जो लोग ब्याज खाते हैं वे [पुनरुत्थान के दिन] खड़े नहीं रह सकते, सिवाय इसके कि वह उस व्यक्ति की तरह खड़ा हो जिसे शैतान द्वारा पागलपन में पीटा जा रहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे कहते हैं, “व्यापार [सिर्फ] ब्याज की तरह है।” लेकिन अल्लाह ने व्यापार की अनुमति दी है और ब्याज को हराम किया है। अतः जिस किसी को अपने रब की ओर से चेतावनी मिल गई और वह उससे बाज़ आया तो उसे वही मिलेगा जो बीत चुका है, और उसका मामला अल्लाह पर निर्भर है। परन्तु जो कोई (ब्याज या सूदखोरी में) लौट आए – वही आग के साथी हैं; वे उसमें अनन्त काल तक निवास करेंगे।

Verse 275 (English):
Those who consume interest cannot stand [on the Day of Resurrection] except as one stands who is being beaten by Satan into insanity. That is because they say, “Trade is [just] like interest.” But Allah has permitted trade and has forbidden interest. So whoever has received an admonition from his Lord and desists may have what is past, and his affair rests with Allah. But whoever returns to [dealing in interest or usury] – those are the companions of the Fire; they will abide eternally therein.

Verse 276 (Arabic):
يَمْحَقُ اللَّهُ الرِّبَا وَيُرْبِي الصَّدَقَاتِ ۗ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ

Verse 276 (Transliteration):
अल्लाह ब्याज को नष्ट कर देता है और दान में वृद्धि देता है। और अल्लाह हर पापी काफ़िर को पसन्द नहीं करता।

Verse 276 (English):
Allah destroys interest and gives increase for charities. And Allah does not like every sinning disbeliever.

Verse 277 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

Verse 277 (Transliteration):
निस्संदेह, जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी, उन्हें उनके रब की ओर से प्रतिफल मिलेगा, और न उन्हें कोई भय होगा और न वे शोक करेंगे।

Verse 277 (English):
Indeed, those who believe and do righteous deeds and establish prayer and give zakah will have their reward with their Lord, and there will be no fear concerning them, nor will they grieve.

Verse 277 (Arabic):
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

Verse 277 (Transliteration):
निस्संदेह, जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी, उन्हें उनके रब की ओर से प्रतिफल मिलेगा, और न उन्हें कोई भय होगा और न वे शोक करेंगे।

Verse 277 (English):
Indeed, those who believe and do righteous deeds and establish prayer and give zakah will have their reward with their Lord, and there will be no fear concerning them, nor will they grieve.

Verse 278 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَذَرُوا مَا بَقِيَ مِنَ الرِّبَا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Verse 278 (Transliteration):
ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो और जो कुछ ब्याज में रह गया है उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमानवाले हो।

Verse 278 (English):
O you who have believed, fear Allah and give up what remains [due to you] of interest, if you should be believers.

Verse 279 (Arabic):
فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا فَأْذَنُوا بِحَرْبٍ مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَإِن تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَالِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ

Verse 279 (Transliteration):
और यदि तुम ऐसा न करोगे तो अल्लाह और उसके रसूल की ओर से (तुम्हारे विरुद्ध) युद्ध की सूचना पाओ। लेकिन यदि आप पश्चाताप करते हैं, तो आपको अपना मूल अधिकार मिल सकता है – [इस प्रकार] आप कोई गलत काम नहीं करते हैं, न ही आपके साथ अन्याय होता है।

Verse 279 (English):
And if you do not, then be informed of a war [against you] from Allah and His Messenger. But if you repent, you may have your principal – [thus] you do no wrong, nor are you wronged.

Verse 280 (Arabic):
وَإِن كَانَ ذُو عُسْرَةٍ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيْسَرَةٍ ۚ وَأَن تَصَدَّقُوا خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ

Verse 280 (Transliteration):
और यदि कोई कठिनाई में हो, तो [वहाँ रहने दो] आराम तक के लिए स्थगित कर दो। परन्तु यदि तुम सदका करोगे तो यह तुम्हारे लिये उत्तम है, यदि तुम जानते।

Verse 280 (English):
And if someone is in hardship, then [let there be] postponement until [a time of] ease. But if you give [from your right as] charity, then it is better for you, if you only knew.

Verse 281 (Arabic):
وَاتَّقُوا يَوْمًا تُرْجَعُونَ فِيهِ إِلَى اللَّهِ ۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ

Verse 281 (Transliteration):
और उस दिन से डरो जब तुम अल्लाह की ओर लौटाये जाओगे। तब हर एक प्राणी को उसकी कमाई का बदला दिया जाएगा, और उनके साथ अन्याय न किया जाएगा।

Verse 281 (English):
And fear a Day when you will be returned to Allah. Then every soul will be compensated for what it earned, and they will not be treated unjustly.

Verse 282 (Arabic):
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى فَاكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُم كَاتِبٌ بِالْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ اللَّهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ الَّذِي عَلَيْهِ الْحَقُّ وَلْيَتَّقِ اللَّهَ رَبَّهُ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْئًا ۚ فَإِن كَانَ الَّذِي عَلَيْهِ الْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُ بِالْعَدْلِ ۚ وَاسْتَشْهِدُوا شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَامْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَاءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَاهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَاهُمَا الْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ الشُّهَدَاءُ إِذَا مَا دُعُوا ۚ وَلَا تَسْأَمُوا أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰ أَجَلِهِ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ اللَّهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَادَةِ وَأَدْنَىٰ أَلَّا تَرْتَابُوا ۖ إِلَّا أَن تَكُونَ تِجَارَةً حَاضِرَةً تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوا إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَارَّ كَاتِبٌ وَلَا شَهِيدٌ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا فَإِنَّهُ فُسُوقٌ بِكُمْ ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ اللَّهُ ۗ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

Verse 282 (english ):
“O you who have believed, when you contract a debt for a specified term, write it down. And let a scribe write [it] between you in justice. Let no scribe refuse to write as Allah has taught him. So let him write and let the one who has the obligation dictate. And let him fear Allah, his Lord, and not leave anything out of it. But if the one who has the obligation is of limited understanding or weak or unable to dictate himself, then let his guardian dictate in justice. And bring to witness two witnesses from among your men. And if there are not two men [available], then a man and two women from those whom you accept as witnesses – so that if one of the women errs, then the other can remind her. And let not the witnesses refuse when they are called upon. And do not be [too] weary to write it, whether it is small or large, for its [specified] term. That is more just in the sight of Allah and stronger as evidence and more likely to prevent doubt between you, except when it is an immediate transaction which you conduct among yourselves. For [then] there is no blame upon you if you do not write it. And take witnesses when you conclude a contract. Let no scribe be harmed or any witness. For if you do so, indeed, it is [grave] disobedience in you. And fear Allah. And Allah teaches you. And Allah is Knowing of all things.”

Verse 282 (hindi):
“ऐ ईमान लाने वालों, जब तुम किसी निश्चित अवधि के लिए ऋण का अनुबंध करो, तो उसे लिख लो। और एक मुंशी को न्याय के साथ तुम्हारे बीच इसे लिखने दो। कोई भी मुंशी लिखने से इनकार न करे जैसा कि अल्लाह ने उसे सिखाया है। इसलिए उसे लिखने दो और जिस पर दायित्व है वह हुक्म दे। और वह अल्लाह, अपने पालनहार से डरे और उसमें से कुछ भी न छोड़े। परन्तु यदि जिस पर दायित्व है वह कम समझ वाला है या कमज़ोर है या अपने आप को हुक्म देने में असमर्थ है, तो उसे अपने अभिभावक न्याय का हुक्म सुनाएँ। और अपने आदमियों में से दो गवाहों को गवाही देने के लिए ले आएँ। और यदि दो आदमी न हों, तो जिन लोगों को तुम गवाह बनाओ उनमें से एक आदमी और दो स्त्रियाँ हों, ताकि यदि स्त्रियों में से कोई गलती करे, तब दूसरा उसे याद दिला सकता है। और जब गवाह बुलाए जाएं तो इनकार न करें। और इसे लिखने में न थकें, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, उसके [निर्दिष्ट] कार्यकाल के लिए। यह अधिक न्यायसंगत है अल्लाह की नज़र और सबूत के रूप में मजबूत और आपके बीच संदेह को रोकने की अधिक संभावना है, सिवाय इसके कि जब यह एक तत्काल लेनदेन हो जिसे आप आपस में करते हैं। क्योंकि यदि तुम इसे न लिखो तो तुम पर कोई दोष नहीं। और जब आप अनुबंध समाप्त करें तो गवाह लें। किसी भी मुंशी या किसी गवाह को नुकसान न पहुंचे। क्योंकि यदि तुम ऐसा करोगे, तो यह तुम्हारी ओर से [गंभीर] अवज्ञा है। और अल्लाह से डरो. और अल्लाह तुम्हें सिखाता है. और अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है।”

Verse 283-286 (Arabic):
وَإِذَا كُنتُمْ فِي سَفَرٍ وَلَمْ تَجِدُوا كَاتِبًا فَرِهَانٌ مَّقْبُوضَةٌ ۖ فَإِنْ أَمِنَ بَعْضُكُم بَعْضًا فَلْيُؤَدِّ الَّذِي اؤْتُمِنَ أَمَانَتَهُ وَلْيَتَّقِ اللَّهَ رَبَّهُ ۗ وَلَا تَكْتُمُوا الشَّهَادَةَ ۚ وَمَن يَكْتُمْهَا فَإِنَّهُ آثِمٌ قَلْبُهُ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ

لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَإِن تُبْدُوا مَا فِي أَنفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُم بِهِ اللَّهُ ۖ فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ ۚ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ

لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

Verse 283-286 (Transliteration):

श्लोक 283-286 (अंग्रेजी):

283. और यदि आप यात्रा पर हैं और कोई मुंशी नहीं मिल रहा है, तो जमानत राशि ले ली जानी चाहिए। और यदि तुम में से कोई दूसरे को भरोसा देता है, तो जिस पर भरोसा किया गया है वह अपना भरोसा पूरी तरह निभाए और अल्लाह, अपने पालनहार से डरे। और गवाही न छिपाओ, जो कोई उसे छिपाएगा, उसका दिल सचमुच पापी है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे जानता है।

284. जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, अल्लाह का है। जो कुछ तुम्हारे भीतर है उसे तुम चाहे दिखाओ या छिपाओ, अल्लाह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर देगा और जिसे चाहे अज़ाब देगा और अल्लाह हर चीज़ पर समर्थ है।

285. रसूल ने उस पर ईमान लाया जो उसके रब की ओर से उस पर उतारा गया था, और ईमानवालों ने भी ऐसा ही किया। वे सभी अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके दूतों पर विश्वास करते हैं, [कहते हैं], “हम उसके किसी भी दूत के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं।” और वे कहते हैं, “हम सुनते हैं और हम मानते हैं। [हम चाहते हैं] आपकी क्षमा, हमारे भगवान, और आप ही [अंतिम] गंतव्य हैं।”

286. अल्लाह किसी आत्मा से उसकी क्षमता के अलावा कोई शुल्क नहीं लेता। इसने जो [अच्छा] कमाया है, उसका [परिणाम] भोगेगा, और इसने जो [बुरा] कमाया है, उसका [परिणाम] भोगेगा। “हमारे भगवान, अगर हम भूल गए हैं या गलती की है तो हम पर दोष न डालें। हमारे भगवान, और हम पर उस तरह का बोझ न डालें जो आपने हमसे पहले लोगों पर डाला था। हमारे भगवान, और हम पर उस चीज़ का बोझ न डालें जो हमारे पास नहीं है सहन करने की क्षमता। और हमें क्षमा करें; और हमें क्षमा करें; और हम पर दया करें। आप हमारे रक्षक हैं, इसलिए हमें अविश्वासी लोगों पर विजय प्रदान करें।”

Verse 283-286 (English):

283. And if you are on a journey and cannot find a scribe, then a security deposit [should be] taken. And if one of you entrusts another, then let him who is entrusted discharge his trust [faithfully] and let him fear Allah, his Lord. And do not conceal testimony, for whoever conceals it – his heart is indeed sinful, and Allah is Knowing of what you do.

284. To Allah belongs whatever is in the heavens and whatever is in the earth. Whether you show what is within yourselves or conceal it, Allah will bring you to account for it. Then He will forgive whom He wills and punish whom He wills, and Allah is over all things competent.

285. The Messenger has believed in what was revealed to him from his Lord, and [so have] the believers. All of them have believed in Allah and His angels and His books and His messengers, [saying], “We make no distinction between any of His messengers.” And they say, “We hear and we obey. [We seek] Your forgiveness, our Lord, and to You is the [final] destination.”

286. Allah does not charge a soul except [with that within] its capacity. It will have [the consequence of] what [good] it has gained, and it will bear [the consequence of] what [evil] it has earned. “Our Lord, do not impose blame upon us if we have forgotten or erred. Our Lord, and lay not upon us a burden like that which You laid upon those before us. Our Lord, and burden us not with that which we have no ability to bear. And pardon us; and forgive us; and have mercy upon us. You are our protector, so give us victory over the disbelieving people.”

Verse 286-290 (Arabic):

**286. وَلَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

287. ۞ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ

288. لَّا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَيِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِن بِاللَّهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ لَا انفِصَامَ لَهَا ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

289. اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا أَوْلِيَاؤُهُمُ الطَّاغُوتُ يُخْرِجُونَهُم مِّنَ النُّورِ إِلَى الظُّلُمَاتِ ۗ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

290. تَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَتَشْهَدُونَ أَنَّا مُسْلِمُونَ

Verse 286-290 (English):

286. Allah does not burden a soul beyond that it can bear. It will have [the consequence of] what [good] it has gained, and it will bear [the consequence of] what [evil] it has earned. “Our Lord, do not impose blame upon us if we have forgotten or erred. Our Lord, and lay not upon us a burden like that which You laid upon those before us. Our Lord, and burden us not with that which we have no ability to bear. And pardon us; and forgive us; and have mercy upon us. You are our protector, so give us victory over the disbelieving people.”

287. Allah – there is no deity except Him, the Ever-Living, the Sustainer of [all] existence. Neither drowsiness overtakes Him nor sleep. To Him belongs whatever is in the heavens and whatever is on the earth. Who is it that can intercede with Him except by His permission? He knows what is [presently] before them and what will be after them, and they encompass not a thing of His knowledge except for what He wills. His Kursi extends over the heavens and the earth, and their preservation tires Him not. And He is the Most High, the Most Great.

288. There shall be no compulsion in [acceptance of] the religion. The right course has become clear from the wrong. So whoever disbelieves in Taghut and believes in Allah has grasped the most trustworthy handhold with no break in it. And Allah is Hearing and Knowing.

289. Allah is the ally of those who believe. He brings them out from darknesses into the light. And those who disbelieve – their allies are Taghut. They take them out of the light into darknesses. Those are the companions of the Fire; they will abide eternally therein.

290. Do you not see that to Allah prostrates whoever is in the heavens and whoever is on the earth and the sun, the moon, the stars, the mountains, the trees, the moving creatures and many of the people? But upon many the punishment has been justified. And he whom Allah humiliates – for him there is no bestower of honor. Indeed, Allah does what He wills.

Verse 286-290 (hindi ):

श्लोक 286-290 (अंग्रेजी):

286. अल्लाह किसी आत्मा पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता। इसने जो [अच्छा] कमाया है, उसका [परिणाम] भोगेगा, और इसने जो [बुरा] कमाया है, उसका [परिणाम] भोगेगा। “हमारे भगवान, अगर हम भूल गए हैं या गलती की है तो हम पर दोष न डालें। हमारे भगवान, और हम पर उस तरह का बोझ न डालें जो आपने हमसे पहले लोगों पर डाला था। हमारे भगवान, और हम पर उस चीज़ का बोझ न डालें जो हमारे पास नहीं है सहन करने की क्षमता। और हमें क्षमा करें; और हमें क्षमा करें; और हम पर दया करें। आप हमारे रक्षक हैं, इसलिए हमें अविश्वासी लोगों पर विजय प्रदान करें।”

287. अल्लाह – उसके अलावा कोई देवता नहीं है, जो सदैव जीवित है, [सभी] अस्तित्व का पालनकर्ता है। न तो उनींदापन उसे घेरता है और न ही नींद। उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है। वह कौन है जो उसकी अनुमति के बिना उसके साथ मध्यस्थता कर सकता है? वह जानता है कि उनके सामने क्या है और उनके बाद क्या होगा, और वे उसके ज्ञान की किसी चीज़ को अपने घेरे में नहीं लेते, सिवाय इसके कि जो वह चाहता है। उसकी कुर्सी आकाश और पृथ्वी तक फैली हुई है, और उनका संरक्षण उसे थकाता नहीं है। और वह परमप्रधान, परम महान है।

288. धर्म को स्वीकार करने में कोई बाध्यता नहीं होगी। ग़लत से सही रास्ता स्पष्ट हो गया है। तो जो कोई भी ताग़ुत पर अविश्वास करता है और अल्लाह पर विश्वास करता है उसने सबसे भरोसेमंद हाथ पकड़ लिया है जिसका कोई तोड़ नहीं है। और अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

289. अल्लाह ईमान लाने वालों का सहयोगी है। वह उन्हें अंधकार से प्रकाश में लाता है। और जो लोग अविश्वास करते हैं – उनके सहयोगी तागुत हैं। वे उन्हें प्रकाश से अंधकार में ले जाते हैं। वे आग के साथी हैं; वे उसमें अनन्त काल तक निवास करेंगे।

290. क्या तुमने नहीं देखा कि जो कोई आकाशों में है और जो कोई धरती पर है और सूर्य, चंद्रमा, तारे, पहाड़, वृक्ष, रेंगनेवाले जीव और बहुत से लोग अल्लाह को सजदा करते हैं? लेकिन कई लोगों को सज़ा उचित ठहराया गया है. और जिसे अल्लाह अपमानित करे, उसके लिए कोई सम्मान देने वाला नहीं। निस्संदेह, अल्लाह जो चाहता है वही करता है।

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